देवी छिन्नमस्तिका को छिन्नमस्ता और चिंतपूर्णी के नाम से भी जाना जाता है। यह दसमहाविद्याओं में तीसरी महाविद्या है। देवी छिन्नमस्ता सूर्य से निकलने वाले प्रकाश के समान चमकती हैं। वह साहस एवं बलिदान की देवी मानी जाती हैं। विपत्ति के समय वह भक्तों को कष्टों का सामना करने की शक्ति प्रदान करती हैं तथा उनके कष्टों का निवारण भी करती हैं। उनके एक हाथ में उनका शीश है तथा दूसरे में उनकी कटार है । इन्हे प्रचंड चंडिका के नाम से भी जाना जाता है। मार्कंडेय पुराण व शिव पुराण आदि में देवी के इस रूप का वर्णन किया गया है । माना जाता है की देवी ने यह रूप धरकर राक्षसों का संहार किया था। इस रूप की व्याख्या कई पौराणिक धर्म ग्रंथों में उल्लेखित है। देवी छिन्नमस्तिका सात्विक, राजसिक तथा तामसिक, इन तीनों ही गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह शेर की सवारी करती हैं। वह चतुर्भुजी है तथा उनके विभिन्न स्वरूप हैं जिसमें से एक स्वरूप में अपनी सुविधाओं का त्यागकर अपने बच्चों के लिए उपस्थित होती हैं। अर्थात अपना शीश काटकर अपने बच्चों जय और विजय को रक्तपान कराती दर्शाई गई हैं।
देवी की कृपा से व्यक्ति के जीवन के सभी दुखों का हल निकल जाता है। तथा वह अपने भक्तों को सकुशल स्वास्थ्य व कर्ज से छुटकारा मिलने का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।
बंगाल के बिष्णुपुर का छिन्नमस्ता मंदिर देवी के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यहाँ देवी की पूजा करने से व्यक्ति का कोई कार्य विफल नहीं होता। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है और वह धन से जुड़ें कष्टों से छुटकारा पाना चाहता है या उसका घर नकारात्मक शक्तियों से बंध गया है तो यह पूजा ही वह मार्ग है जिसकी उसे तलाश है। इस पूजा से उसे देवी का आशीर्वाद प्राप्त होगा जिससे उसके दुखों का निवारण होगा तथा उसे सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन प्राप्त होगा।
हमारी सेवाएं :-
हमारे पंडित जी द्वारा अनुष्ठान से पहले संकल्प के लिए आपको फोन किया जाएगा। तत्पश्चात आपके लिए पूरे विधिविधान से पूजा संपन्न कराई जाएगी ।अनुष्ठान संपन्न होने के बाद प्रसाद भी भिजवाया जाएगा ।
प्रसाद-
- पंचमेवा
- उर्जित धागा (गले में पहने के लिए )