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आरती वह पावन स्तुति है, जिसे गाकर भक्तजन भगवान से जुड़ने का अनुभव प्राप्त करते हैं। आरती के माध्यम से भगवान की उपासना की जाती है और आरती के दौरान भक्तजन भजन गाते हुए धूप, दीप आदि विशेष विधि से भगवान के समक्ष अर्पित करते हैं।

मंदिरों में प्रातःकाल उठते ही सबसे पहले भगवान को प्रणाम कर उनकी पूजा की जाती है और उसके पश्चात आरती होती है। यही क्रम संध्या पूजा में भी दोहराया जाता है। रात्रि में मंदिर के कपाट बंद करने से पहले भी आरती की जाती है। मान्यता है कि आरती करने वाले ही नहीं, बल्कि उसमें सम्मिलित होने वाले प्रत्येक भक्त पर भी प्रभु की कृपा बनी रहती है और उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है। आरती के दौरान देवी-देवताओं को पुष्प अर्पित किए जाते हैं। मंदिरों में अक्सर फूलों की सजावट के साथ आरती का आयोजन होता है, जिसका दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। फिर चाहे मंदिर हो या फिर गंगा घाट, आरती के माध्यम से सकारात्मकता हमारे भीतर आती है और भगवान के साथ सीधा संपर्क स्थापित होता है।

आरती करते समय भक्त का मन निर्मल और श्रद्धा से पूर्ण होना चाहिए। पूर्ण समर्पण के साथ की गई आरती ही सच्चा फल प्रदान करती है। माना जाता है कि इस समय भक्त अपने अंतर्मन से भगवान का आह्वान करते हैं।

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