
Nirjala Ekadashi 2026: सनातन धर्म में निर्जला एकादशी को 24 एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके पीछे का कारण है कि इस दिन बिना जल को ग्रहण किए उपवास रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसे सभी एकादशी के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में बताया गया है कि निर्जला एकादशी पर श्रीहरि और माता लक्ष्मी की विधिवत पूजा की जाती है, ऐसा करने से जीवन के समस्त समस्याओं का नाश होता है।
स्कंद पुराण में चौबीसों एकादशी का वर्णन देखने को मिलता है जिसमें से एक है निर्जला एकादशी। ज्येष्ठ महीना साल भर का सबसे गर्म समय होता है जिसमें बिना जल के रह पाना अत्यंत मुश्किल होता है किंतु ये व्रत इसी कठिनाई और तप को दर्शाता है। बताया जाता है कि जो व्यक्ति निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसे साल की सभी एकादशी व्रत का शुभ फल प्राप्त हो जाता है। सभी एकादशियों में इसे सर्वश्रेष्ठ माने जाने का कारण ये भी है कि सही विधि और विधान से व्रत करने पर व्यक्ति के पुराने जन्म के पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि ये कहीं ना कहीं महाभारत काल में पांडवों से भी संबंधित है। पांडवों में भीमसेन अत्यंत बलशाली थे लेकिन उन्हें भोजन बहुत प्रिय था। जब युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और माता कुंती सभी एकादशी का व्रत रखते थे तब भीमसेन के मन में अक्सर ये ख्याल आता कि वह भी व्रत रखें किंतु उनकी भूख के कारण वह व्रत नहीं कर पाते थे।
एक दिन भीमसेन चिंतिति होकर महर्षि वेदव्यास के पास गए और उनसे कहा कि गुरुदेव, मुझसे भूखा नहीं रहा जाता। मेरे उदर में ‘वृक’ नाम की एक अग्नि जलती रहती है जिसे शांत करने के लिए मुझे भरपूर भोजन चाहिए। मैं सभी एकादशियों का व्रत करने में असमर्थ हूँ लेकिन धर्म का पालन भी करना चाहता हूँ। मेरे परिवार में हर सदस्य 24 एकादशी का व्रत करते हैं किंतु मैं ही ऐसा हूं जो व्रत करने के सहाय नहीं हूं, ऐसा रहा तो मैं कभी भगवान विष्णु की कृपा से वंचित रह जाऊंगा। आप ऐसा कोई उपाय बताइए जिससे मुझे सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो जाए।
तब महर्षि वेदव्यास ने कहा कि हे भीमसेन, यदि तुम वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त करना चाहते हो तो ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का कठोर व्रत करो। इस दिन बिना अन्न और जल के भगवान विष्णु का स्मरण करना होगा। यह एक व्रत सभी एकादशियों के समान फल देने वाला है। पूरे दिम ना अन्न ना अन्न का सेवन करना और ना ही जल का। इसी के साथ दिन भर तुम्हें भगवान विष्णु के महामंत्र ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:’ मंत्र का जाप करते रहना होगा।
वेदव्यास की बात सुनकर भीमसेन ने इस व्रत को करने का ठाना और ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी आने पर श्रद्धा से उस व्रत को स्वीकार किया। तभी से यह एकादशी भीमसेनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हुई।
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