पितृ पक्ष में पंचमी श्राद्ध के विशेष नियम बताए गए हैं। शास्त्रों के अनुसार सही रीति-रिवाज से तर्पण करने पर पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और घर में सुख, शांति के साथ समृद्धि का वास होता है। आइए इस दिन से जुड़ी प्रमुख बातों को जानते हैं।
अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाला पितृ पक्ष हमारे पूर्वजों को समर्पित है, जब पितृ पक्ष के दौरान चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक साथ आता है, तो इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। शास्त्रों में चतुर्थी और पंचमी तिथि के श्राद्ध को विशेष फलदायी माना गया है। चतुर्थी तिथि विशेष रूप से गणेश जी की प्रिय तिथि है और पंचमी तिथि को कुंवारी पंचमी या अविवाहितों के श्राद्ध के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन भगवान श्री गणेश की आराधना के साथ-साथ पितरों का तर्पण करने से घर के सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और पितरों का आशीर्वाद सदैव बना रहता है।
भगवान गणेश के साथ ऐसे पाएं पितरों की कृपा
प्रथम पूज्य गणेश जी का ध्यान
सुबह स्नान के बाद सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें। उन्हें दूर्वा, हल्दी, अक्षत और मोदक या लड्डू अर्पित करें।
विघ्न दूर करने की प्रार्थना
गणेश जी से प्रार्थना करें कि आपके द्वारा किए जा रहे श्राद्ध और तर्पण काम में कोई बाधा न आए और पितृ प्रसन्न होकर भोग स्वीकार करें।
पितृ देव और गणेश जी का संबंध
ऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश की कृपा के बिना पितरों तक तर्पण की सामग्री नहीं पहुंचती। इसलिए गणेश पूजन के बाद ही पितृ तर्पण और पिंड दान का काम शुरू करें।
पितृ तर्पण के मुख्य नियम और जरूरी बातें
कुशा और तिल का उपयोग: तर्पण करते समय हाथ में कुशा धारण करें और जल में काले तिल तथा जल-दूध-गंगाजल का मिश्रण जरूर मिलाएं।
दिशा का ध्यान: पितृ तर्पण हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके ही किया जाता है, क्योंकि दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना गया है।
कुतुप और रोहिण काल: श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर के समय किए जाते हैं। कुतुप काल और रोहिण काल को श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ समय माना गया है। सुबह या सूर्यास्त के बाद श्राद्ध न करें।
पंचबलि भोग जरूर निकालें: भोजन तैयार होने के बाद सबसे पहले पंचबलि के लिए भोजन का हिस्सा गाय, कुत्ता, कौआ, देव और चींटी के लिए अलग निकालें। ऐसी मान्यता है कि कौए के माध्यम से भोजन सीधे पितरों तक पहुंचता है।
ब्राह्मण भोजन: ब्राह्मण को घर बुलाकर श्रद्धापूर्वक भोजन कराएं। इसके बाद वस्त्र, अन्न, तिल और दक्षिणा देकर विदा करें।
चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध में क्या न करें?
तामसिक भोजन से परहेज: श्राद्ध के दिनों में घर में लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा और बासी भोजन का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है।
क्रोध और अहंकार से बचें: तर्पण या दान करते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और नम्रता रखें। क्रोध या अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने से श्राद्ध का फल खत्म हो जाता है।
लोहे के बर्तनों का परहेज: तर्पण और श्राद्ध का भोजन बनाने में तांबे, पीतल या चांदी के बर्तनों का ही उपयोग करें। लोहे के बर्तनों का प्रयोग वर्जित माना गया है।