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वट सावित्री व्रत – अखंड सौभाग्य और पति दीर्घायु व्रत

वट सावित्री व्रत 2026

हमारी सनातन संस्कृति में प्रत्येक तिथि में कोई ना कोई व्रत-त्योहार अवश्य ही आता है और यह त्योहार हमारे पौराणिक परंपरा से जुड़े हुए हैं। हमारे पर्व व्यक्तिगत जीवन के साथ- साथ प्रकृति के साथ जुड़े हुए हैं। वट सावित्री व्रत भी इन्हीं त्योहारों में एक है, जिसमें पति की लंबी आयु की कामना के लिए वट वृक्ष की पूजा की जाती है और व्रत का पालन किया जाता है। वट सावित्री व्रत पति-पत्नी के अटूट प्रेम, समर्पण और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। यह व्रत विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना के लिए श्रद्धा और भक्ति भाव से रखती हैं। इस दिन वह वट वृक्ष की पूजा करती हैं और सावित्री तथा सत्यवान की कथा सुनती हैं। कथा के अनुसार इस व्रत में इतनी अधिक शक्ति है कि सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापिस पा लिए थे।

वट सावित्री व्रत प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या के दिन रखा जाता है, वहीं कुछ प्रांतों में यह व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन रखते हैं। पंचांग के अनुसार अमान्त तथा पूर्णिमान्त चन्द्र कैलेण्डर के अधिकतर त्योहार एक ही मनाए जाते हैं, लेकिन उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब एवं हरियाणा आदि प्रांतों में व्रत सावित्री व्रत पूर्णिमान्त कैलेण्डर, यानी कि ज्येष्ठ अमावस्या के अनुसार रखा जाता है। वहीं, अन्य प्रांतों में व्रत सावित्री व्रत अमान्त चन्द्र कैलेण्डर, यानी कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसलिए देखा जाए तो ज्येष्ठ अमावस्या के 15 दिनों के बाद महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिणी भारतीय राज्यों में वट सावित्री का व्रत रखा जाता है।

वट सावित्री व्रत तिथि, समय और मुहूर्त 2026

वट सावित्री व्रत प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या के दिन मनाया जाता है और वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत 16 मई को है। ज्येष्ठ अमावस्या तिथि का प्रारंभ 16 मई को सुबह 5 बजकर 11 मिनट पर हो रहा है और वहीं इस तिथि का समापन 17 मई को तड़के 1 बजकर 30 मिनट पर हो रहा है।

2027 और 2028 में वट सावित्री तिथि

वर्ष वट सावित्री अमावस्या वट सावित्री पूर्णिमा व्रत अमावस्या तिथि प्रारम्भ अमावस्या तिथि समाप्त
2027 शुक्रवार, जून 4, 2027 को शुक्रवार, जून 18, 2027 को जून 04, 2027 को 04:05 AM बजे जून 05, 2027 को 01:09 AM बजे
2028 बुधवार, मई 24, 2028 को मंगलवार, जून 6, 2028 को मई 23, 2028 को 02:09 PM बजे मई 24, 2028 को 01:45 PM बजे

वट सावित्री क्या है?

वट सावित्री व्रत सौभाग्यवति स्त्रीयां अपने पति की दीर्घायु की कामना के लिए रखती हैं। वट सावित्री में वट का तात्पर्य वट वृक्ष (बरगद, बड़) से है और सावित्री वही स्त्री है, जिसने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राणों को वापिस पा लिया था। इसलिए कहा जाता है कि इस व्रत में काफी अधिक शक्ति होती है।

वट सावित्री व्रत कथा

सावित्री और सत्यवान की पावन कथा को निम्नलिखित अध्यायों में पढ़ें:

राजा अश्वपति और सावित्री का जन्म

एक समय की बात है, भद्र देश में अश्वपति नाम के राजा निवास करते थे, लेकिन उनकी कोई भी संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की कामना के लिए उन्होंने प्रतिदिन मंत्रोच्चारण किया और एक लाख आहुतियां देना प्रारंभ किया। यही क्रम वह 18 सालों तक करते रहे। राजा की भक्ति और समर्पण देख सावित्री माता उनके समक्ष प्रकट हुईं और उन्होंने राजा को वर दिया “राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी”। देवी के वरदान के कुछ समय के बाद राजा के घर एक कन्या का जन्म हुआ। सावित्री देवी की कृपा से कन्या का जन्म हुआ, तो राजा ने अपनी पुत्री का नाम सावित्री रखा।

सावित्री ने सत्यवान को चुना

सावित्री जब बड़ी हुई तो वह बहुत सुंदर और रूपवान थी, लेकिन योग्य वर ना मिलने के कारण राजा इस बात से दुखी थे। फिर उन्होंने सावित्री को स्वयंवर खोजने को लिए भेज दिया। सावित्री वर की तलाश के लिए तपोवन में भटकने लगी। तब सावित्री की मुलाकात द्युमत्सेन से होती है, वो साल्व देश के राजा थे, लेकिन उस समय राजा से उनका राजपाठ छीन गया था। तब सावित्री राजा के पुत्र सत्यवान से विवाह के लिए तैयार हो जाती हैं।

नारद जी की भविष्यवाणी

नारद जी को जब पता लगता है कि सावित्री ने सत्यवान को पति के रूप में चुन लिया है, तब वह राजा अश्वपति के पास जाते हैं और कहते हैं कि ‘हे राजन यह आप क्या कर रहे हैं? सत्यवान गुणवान हैं, बलवान हैं और धर्मात्मा भी हैं, लेकिन वह अल्पायु हैं। एक वर्ष के बाद उसकी मृत्यु तय है।

सावित्री का कठिन वैवाहिक जीवन

सावित्री के पिता उसे सत्यवान से विवाह करने के लिए मना करते हैं, लेकिन लाख मना करने के बाद भी सावित्री ने सत्यवान को ही अपने पति के रूप में स्वीकार करना चाहा। वह अपने पिता को कहती है कि आर्य कन्याएं एक ही बार अपने पति का वरण करती है और इसी प्रकार से राजा भी एक ही बार आज्ञा देते हैं, पंडित भी एक ही बार प्रतिज्ञा करते हैं और एक ही बार कन्यादान भी किया जाता है। अपनी पुत्री सावित्री के हठ के सामने राजा समर्पण कर लेते हैं और फिर सावित्री का विवाह सत्यवान से होता है। सावित्री के विवाह के बाद वह अपने ससुराल जाती है और वहां वह अपने पति के साथ- साथ सास ससुर की सेवा करने लगती है। सत्यवान की मृत्यु के बारे में पता होने के बाद भी वह निरंतर अपने परिवार की सेवा करती रही।

सत्यवान की मृत्यु का दिन

सत्यवान की मृत्यु के दिन जब समीप आने लगे तो सावित्री बेचैन होने लगी और फिर जब मृत्यु के केवल तीन ही दिन शेष बचे थे, तो सावित्री ने उपवास शुरू कर दिया और नारद ऋषि द्वारा बताए अनुसार पितरों का तर्पण और पूजन भी किया। अपने दैनिक उपयोग के लिए सत्यवान रोज़ाना जंगल में लकड़ी काटने के लिए जाता था और मृत्यु वाले दिन सावित्री भी उसके साथ जाती है। लकड़ी के लिए सत्यवान पेड़ पर चढ़ते हैं और तभी उन्हें अचानक से दर्द होने लगता है। उसका दर्द असहनीय होता है और वह पेड़ से नीचे उतर जाता है। यह देख सावित्री समझ जाती है कि अब सत्यवान की मृत्यु आ गई है। फिर तभी यमराज वहां आते हैं और वह सत्यवान को अपने साथ लेकर जाने लगते हैं।

सावित्री करती हैं यमराज का पीछा

सावित्री भी यमराज के पीछे- पीछे चलने लगती हैं। यमराज सावित्री को साथ आने को मना करते हैं और कहते हैं कि यही विधि का विधान है और इसे टाला नहीं जा सकता है। लेकिन सावित्री यमराज की नहीं सुनती है। सत्यवान के प्रति निष्ठा और पतिव्रता देख यमराज कहते हैं कि हे सावित्री तुम धन्य हो, तुम कोई वर मांगो।

यमराज ने दिया सावित्री को वरदान

सावित्री वर मांगते हुए कहती है कि मेरे सास- ससुर नेत्रहीन हैं, उन्हें आंखों की रौशनी दो, तब यमराज तथास्तु कहते हुए उसे वहां से जाने के लिए कहते हैं। लेकिन सावित्री फिर यम के साथ उनके पीछे- पीछे चलने लगती है। यमराज फिर उसे वर मांगने के लिए कहते हैं, तब सावित्री कहती है कि मेरे ससुर का खोया हुआ सामराज्य उन्हें वापिस लौटा दिया जाए और यमराज इस बात पर भी तथास्तु कहते हैं और आगे बढ़ने लगते हैं। लेकिन सावित्री यहां नहीं रुकती है वह फिर उनके साथ चलने लगती है। सावित्री की भक्ति से यमराज पिघल जाते हैं और फिर से वरदान मांगने को कहते हैं। इस बार सावित्री कहती है कि मैं सत्यवान के 100 पुत्रों की मां बनने का सौभाग्य प्राप्त करना चाहती हूं और यमराज इस वरदान पर भी तथास्तु कहते हैं।

ऐसे में अब सौ पुत्रों का वरदान पाने के बाद यमराज वचनबद्ध हो गए और फिर सत्यवान की आत्मा को उन्होंने मुक्त कर दिया। जब सावित्री वट वृक्ष के पास आई तो उसने देखा कि सत्यवान के शरीर में रक्त संचार होने लगा है और उसकी सांस चल रही है। फिर जब दोनों घर जाते हैं तो देखते हैं कि उसके सास-ससुर की आंखें वापिस आ जाती हैं और उन्हें राज्य भी वापिस मिल जाता है। तो इस प्रकार से सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की और यमराज से वापिस लेकर आई।

वट सावित्री व्रत पूजा विधि

  1. सुहागिन महिलाओं को प्रातः स्नान करके व्रत एवं पूजा का संकल्प लेना चाहिए।
  2. रेत से भरी बांस की टोकरी में ब्रह्मदेव और सावित्री की प्रतिमा स्थापित करें।
  3. दूसरी टोकरी में सत्यवान और सावित्री की प्रतिमा स्थापित करें।
  4. दोनों टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे रखकर विधिपूर्वक पूजा करें।
  5. पूजा में जल, फूल, रोली, मौली, कच्चा सूत, भीगे चने और गुड़ अर्पित करें।
  6. वट वृक्ष को जल चढ़ाकर जलाभिषेक करें।
  7. वट वृक्ष के तने पर कच्चा धागा लपेटते हुए तीन बार परिक्रमा करें।
  8. पूजा के बाद वट सावित्री व्रत कथा सुनना शुभ माना जाता है।
  9. भीगे चने का प्रसाद निकालकर उसमें दक्षिणा रखकर सास को अर्पित करें और आशीर्वाद लें।
  10. यदि सास साथ न हों, तो प्रसाद भेजकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
  11. पूजा पूर्ण होने पर ब्राह्मणों को वस्त्र, फल एवं अन्य वस्तुओं का दान करें।

वट सावित्री व्रत पूजन सामग्री

सामग्री उपयोग
वट वृक्ष (बरगद) मुख्य पूजा एवं परिक्रमा हेतु
जल से भरा कलश जल अर्पण एवं अभिषेक हेतु
रोली तिलक के लिए
मौली (कलावा) पूजा एवं बांधने हेतु
कच्चा सूत वट वृक्ष पर लपेटने हेतु
फूल पूजा अर्पण हेतु
धूप और दीपक पूजन में सुगंध एवं शुद्धता हेतु
गुड़ प्रसाद अर्पित करने हेतु
भीगे हुए चने प्रसाद के रूप में
फल भोग एवं दान हेतु
बांस की टोकरी प्रतिमा स्थापना हेतु
वस्त्र एंव दक्षिणा ब्राह्मण दान हेतु

वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष का महत्व

वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। वट वृक्ष एक मात्र ऐसा वृक्ष है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास होता है, इसलिए इसे अमरत्व और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है। इस व्रत में सौभाग्यवति महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए वट वृक्ष की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर धागा बांधकर परिक्रमा करती हैं। यह परंपरा सावित्री और सत्यवान की कथा से जुड़ी है, जिसमें सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और पतिव्रता धर्म के बल पर अपने पति के प्राण वापस प्राप्त किए थे। वट वृक्ष की विशाल जड़ें, लंबी आयु और सदैव हरा-भरा रहने का गुण वैवाहिक जीवन की स्थिरता, सुरक्षा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

वट सावित्री व्रत मंत्र

'मम वैधव्यादि- सकलदोषपरिहारार्थं ब्रह्मसावित्रीप्रीत्यर्थं
सत्यवत्सावित्रीप्रीत्यर्थं च वटसावित्रीव्रतमहं करिष्ये’

वट सावित्री व्रत आरती

अश्वपती पुसता झाला।। नारद सागंताती तयाला।।
अल्पायुषी सत्यवंत।। सावित्री ने कां प्रणीला।।
आणखी वर वरी बाळे।। मनी निश्चय जो केला।।
आरती वडराजा।।1।।

दयावंत यमदूजा। सत्यवंत ही सावित्री।
भावे करीन मी पूजा। आरती वडराजा ।।धृ।।
ज्येष्ठमास त्रयोदशी। करिती पूजन वडाशी ।।
त्रिरात व्रत करूनीया। जिंकी तू सत्यवंताशी।
आरती वडराजा ।।2।।

स्वर्गावारी जाऊनिया। अग्निखांब कचळीला।।
धर्मराजा उचकला। हत्या घालिल जीवाला।
येश्र गे पतिव्रते। पती नेई गे आपुला।।
आरती वडराजा ।।3।।

जाऊनिया यमापाशी। मागतसे आपुला पती। चारी वर देऊनिया।
दयावंता द्यावा पती।
आरती वडराजा ।।4।।

पतिव्रते तुझी कीर्ती। ऐकुनि ज्या नारी।।
तुझे व्रत आचरती। तुझी भुवने पावती।।
आरती वडराजा ।।5।।

पतिव्रते तुझी स्तुती। त्रिभुवनी ज्या करिती।। स्वर्गी पुष्पवृष्टी करूनिया।
आणिलासी आपुला पती।। अभय देऊनिया। पतिव्रते तारी त्यासी।।

वट सावित्री व्रत रखने के लाभ

वैवाहिक जीवन के लिए आशीर्वाद

वट सावित्री व्रत विवाहित महिलाओं के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और आपसी समझ बढ़ती है। यह व्रत वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और स्थिरता बनाए रखने का संदेश देता है।

पति की दीर्घायु

इस व्रत का मुख्य उद्देश्य पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करना है। महिलाएं पूरे श्रद्धा भाव से व्रत रखकर और वट वृक्ष की पूजा करके अपने पति के जीवन में स्वास्थ्य, सुरक्षा और समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।

परिवार में सुख-समृद्धि

वट सावित्री व्रत को परिवार की खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से घर में सकारात्मक वातावरण बना रहता है और परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम व एकता बढ़ती है।

आध्यात्मिक उन्नति

इस व्रत को करने से मन में श्रद्धा, धैर्य और आत्मविश्वास का विकास होता है। पूजा-पाठ और व्रत के माध्यम से व्यक्ति का मन आध्यात्मिकता की ओर बढ़ता है तथा जीवन में संयम और सकारात्मक सोच का संचार होता है।

सकारात्मक ऊर्जा और सुरक्षा

वट वृक्ष को पवित्र और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि इसमें तीनों देवों का वास होता है। पूजा करने से नकारात्मकता दूर होती है और घर-परिवार में सुख, शांति तथा सुरक्षा का वातावरण बना रहता है।

वट सावित्री व्रत पर क्या करें दान?

वट सावित्री व्रत के पावन अवसर पर दान करना बहुत शुभ माना जाता है। इस व्रत में सुहाग सामग्री जैसे चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, चुनरी और कंघी का दान विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इसके अलावा वस्त्र, फल, अनाज, मिठाई, दक्षिणा और पानी से भरे घड़े का दान भी किया जाता है। गरीब और जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना तथा ब्राह्मणों को दान देना भी पुण्यदायी माना जाता है।

FAQ:

क्या अविवाहित लड़कियाँ वट सावित्री व्रत रख सकती हैं?
हां, अविवाहित लड़कियाँ भी यह व्रत रख सकती हैं। इसे अच्छे जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए किया जाता है।
वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?
वट वृक्ष को दीर्घायु, स्थिरता और त्रिदेवों का प्रतीक माना जाता है। इसकी पूजा से अखंड सौभाग्य और सुरक्षा का आशीर्वाद मिलता है।
क्या वट सावित्री पूजा घर पर की जा सकती है?
हाँ, यदि वट वृक्ष उपलब्ध न हो तो घर पर भी पूजा की जा सकती है। इसके लिए वट वृक्ष की प्रतिमा या चित्र के सामने विधि-विधान से पूजा की जाती है।
वट सावित्री व्रत अमावस्या या पूर्णिमा कब होता है?
यह व्रत क्षेत्र और परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या या पूर्णिमा दोनों में से किसी एक दिन रखा जाता है। अलग-अलग राज्यों में इसकी तिथि अलग हो सकती है।
किन राशियों को वट सावित्री व्रत से अधिक लाभ मिलता है?
यह व्रत सभी राशियों के लिए शुभ माना जाता है। विशेष रूप से वृषभ, कर्क और मकर राशि वालों के लिए इसे अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

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