Bhadrapad Pradosh Vrat 2026: भाद्रपद प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा कैसे करनी चाहिए? आइए इस आर्टिकल में जानते हैं।
भाद्रपद का महीना भक्ति और उपासना के लिए बहुत ही पावन माना जाता है। इस महीने में पड़ने वाले हर एक व्रत का अपना खास धार्मिक महत्व है, लेकिन जब बात भगवान शिव की पूजा की आती है, तो प्रदोष व्रत का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि प्रदोष काल यानी शाम के समय महादेव बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में होते हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं। अगर आप भी इस भाद्रपद प्रदोष व्रत पर भोलेनाथ और माता पार्वती की कृपा पाना चाहते हैं, तो आइए भगवान शिव की पूजा विधि जानते हैं।
घर पर कैसे करें प्रदोष व्रत की पूजा?
प्रदोष व्रत में शाम के समय यानी सूर्यास्त से ठीक पहले और तुरंत बाद का समय सबसे खास माना जाता है। इस समय को ही प्रदोष काल कहते हैं।
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें।
शिव जी के सामने व्रत का संकल्प लें।
प्रदोष व्रत की मुख्य पूजा शाम को होती है। इसलिए शाम के समय फिर से स्नान करके पवित्र वस्त्र पहनें।
घर के मंदिर में या पास के शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर शुद्ध जल, गंगाजल, कच्चा दूध, दही, शहद और घी अर्पित करें।
इसके बाद शिवलिंग पर चंदन का तिलक लगाएं।
फिर बिल्व पत्र, धतूरा, भांग, शमी के पत्ते और सफेद फूल श्रद्धापूर्वक चढ़ाएं।
बिल्व पत्र चढ़ाते समय ध्यान रखें कि वह कटा-फटा न हो और चिकना हिस्सा शिवलिंग की तरफ रहे।
शिवलिंग या शिव परिवार के सामने शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं और धूपबत्ती लगाएं।
प्रदोष व्रत की कथा का पाठ करें।
आरती से पूजा का समापन करें।
अंत में पूजा में हुई सभी गलतियों के लिए माफी मांगे।
भगवान शिव का मनपसंद भोग
दूध या मावे की मिठाई: खीर, पेड़ा या सफेद रंग की कोई भी मिठाई अर्पित करें।
शक्कर और दही: भोलेनाथ को पंचामृत या दही बहुत प्रिय है।
ताजे फल: केला, सेब या कोई भी मौसमी फल अर्पित कर सकते हैं।
भांग का हलवा या पेड़ा: कई लोग शिव पूजा में भांग से बनी चीजों का भी भोग लगाते हैं।
पूजा मंत्र
ॐ नमः शिवाय॥
श्री शिवाय नमस्तुभ्यं॥
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
।।शिवजी की आरती।।
ॐ जय शिव ओंकारा,स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
एकानन चतुराननपञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासनवृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
दो भुज चार चतुर्भुजदसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखतेत्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
अक्षमाला वनमालामुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारीकर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
श्वेताम्बर पीताम्बरबाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिकभूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
कर के मध्य कमण्डलुचक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारीजगपालन कारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
ब्रह्मा विष्णु सदाशिवजानत अविवेका।
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
लक्ष्मी व सावित्रीपार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी,शिवलहरी गंगा॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
पर्वत सोहैं पार्वती,शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन,भस्मी में वासा॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
जटा में गंगा बहत है,गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत,ओढ़त मृगछाला॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
काशी में विराजे विश्वनाथ,नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत,महिमा अति भारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा...
त्रिगुणस्वामी जी की आरतीजो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी,मनवान्छित फल पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा...