
दीवाली से ठीक एक दिन पहले छोटी दीवाली यानी नरक चतुर्दशी मनाई जाती है, लेकिन इस साल यह पर्व 8 नवंबर यानी दीवाली के साथ आज ही मनाया जा रहा है। इस दिन (Narak Chaturdashi 2026) शाम के समय यमराज के नाम का दीपक जलाने की बहुत पुरानी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छोटी दिवाली की रात यमदेव के लिए दीपक जलाने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार के सदस्यों पर यमराज की बुरी नजर नहीं पड़ती। हालांकि यम का दीपक सामान्य दीयों से अलग होता है, इसलिए इसे जलाते समय शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है, तो आइए यहां यम दीपक के नियम जानते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार यमराज के दूतों ने उनसे पूछा कि हे प्रभु क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मनुष्यों को अकाल मृत्यु के भय और यमलोक की यातनाओं से मुक्ति मिल सके? तब यमराज ने मुस्कुराकर कहा था कि कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात जो मनुष्य संध्या समय मेरे नाम से घर के बाहर दक्षिण दिशा में चौमुखी दीपक जलाएगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा और उसके पापों का नाश होगा।" तभी से हर साल छोटी दिवाली की रात यम के नाम का दीपक जलाने की परंपरा चली आ रही है। इसके अलावा, इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर नाम के भयंकर राक्षस का संहार किया था और 16,000 कन्याओं को उसकी कैद से मुक्त कराया था।
धर्मराज कर सिद्ध काज,
प्रभु मैं शरणागत हूँ तेरी ।
पड़ी नाव मझदार भंवर में,
पार करो, न करो देरी ॥
॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥
धर्मलोक के तुम स्वामी,
श्री यमराज कहलाते हो ।
जों जों प्राणी कर्म करत हैं,
तुम सब लिखते जाते हो ॥
अंत समय में सब ही को,
तुम दूत भेज बुलाते हो ।
पाप पुण्य का सारा लेखा,
उनको बांच सुनते हो ॥
भुगताते हो प्राणिन को तुम,
लख चौरासी की फेरी ॥
॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥
चित्रगुप्त हैं लेखक तुम्हारे,
फुर्ती से लिखने वाले ।
अलग अगल से सब जीवों का,
लेखा जोखा लेने वाले ॥
पापी जन को पकड़ बुलाते,
नरको में ढाने वाले ।
बुरे काम करने वालो को,
खूब सजा देने वाले ॥
कोई नही बच पाता न,
याय निति ऐसी तेरी ॥
॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥
दूत भयंकर तेरे स्वामी,
बड़े बड़े दर जाते हैं ।
पापी जन तो जिन्हें देखते ही,
भय से थर्राते हैं ॥
बांध गले में रस्सी वे,
पापी जन को ले जाते हैं ।
चाबुक मार लाते,
जरा रहम नहीं मन में लाते हैं ॥
नरक कुंड भुगताते उनको,
नहीं मिलती जिसमें सेरी ॥
॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥
धर्मी जन को धर्मराज,
तुम खुद ही लेने आते हो ।
सादर ले जाकर उनको तुम,
स्वर्ग धाम पहुचाते हो ।
जों जन पाप कपट से डरकर,
तेरी भक्ति करते हैं ।
नर्क यातना कभी ना करते,
भवसागर तरते हैं ॥
कपिल मोहन पर कृपा करिये,
जपता हूँ तेरी माला ॥
॥ धर्मराज कर सिद्ध काज..॥
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