
सनातन धर्म में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में दशहरा का विशेष स्थान है। यह पर्व अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है। इस दिन देश भर में रावण दहन किया जाता है और भगवान श्री राम की पूजा होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दशहरे के दिन 'शमी पूजन' का भी बहुत बड़ा विधान है? शास्त्रों के अनुसार, विजयादशमी के दिन शस्त्र पूजा के साथ-साथ शमी के पौधे की पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में कभी भी असफलता नहीं आती और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। आइए जानते हैं कि दशहरे (Vijayadashami 2026) पर शमी पूजन क्यों किया जाता है और इसके पीछे कौन सी पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं?
महाभारत काल का प्रसंग
शमी पूजन से जुड़ी सबसे प्रमुख कथा महाभारत काल से जुड़ी है। जब कौरवों ने छल से पांडवों को 12 साल का वनवास और 1 साल का अज्ञातवास दिया था, तब अज्ञातवास में जाने से पहले पांडवों ने अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को शमी के पेड़ के नीचे सुरक्षित छिपा दिया था। साथ ही उन्होंने शमी के पेड़ से अपने अस्त्रों की रक्षा करने की प्रार्थना की थी। जब अज्ञातवास समाप्त हुआ, तब विजयादशमी के दिन पांडवों ने इसी शमी के पेड़ के पास आकर अपने अस्त्र-शस्त्र वापस प्राप्त किए और कौरवों पर विजय हासिल की। तभी से यह मान्यता है कि शमी पूजन से हर काम में विजय मिलती है।
भगवान श्री राम और लंका विजय
दूसरी कथा त्रेतायुग से जुड़ी है। रावण से युद्ध करने और लंका पर आक्रमण करने से पहले भगवान श्री राम ने भी लंका विजय की कामना के लिए मां दुर्गा की पूजा के साथ-साथ शमी के पेड़ की पूजा की थी और भगवान से जीत का आशीर्वाद मांगा था। इसके बाद श्रीराम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की थी।
शनि दोषों से मुक्ति: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शमी का संबंध शनि ग्रह से माना जाता है। दशहरे के शाम के समय शमी के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और कुंडली के अशुभ दोष शांत होते हैं।
विजय का प्रतीक: विजयादशमी के दिन शमी के पौधे की पूजा करने और इसकी पत्तियां एक-दूसरे को बांटने से आपसी प्रेम बढ़ता है और करियर-कारोबार में सफलता मिलती है।
नकारात्मक ऊर्जा का नाश: घर के मुख्य द्वार पर या ईशान कोण में शमी का पौधा लगाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मकता का संचार होता है।
शमी पूजन हमेशा प्रदोष काल में करना सबसे अच्छा माना जाता है।
शाम को स्नान करके शमी के पेड़ के पास जाएं।
पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें, रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएं।
शमी के पौधे के पास सरसों के तेल का दीपक जलाएं और मिठाई का भोग लगाएं।
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