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मुरलीधर को किसने दिया कृष्ण नाम? जानिए कान्हा के नामकरण की यह पौराणिक कथा

Vaishnavi DwivediVaishnavi DwivediUpdated 01 Sep 2026 12:25 PM IST
मुरलीधर को किसने दिया कृष्ण नाम? जानिए कान्हा के नामकरण की यह पौराणिक कथा

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Who Named Lord Krishna: क्या आप जानते हैं कि श्रीकृष्ण को 'कृष्ण' नाम किसने दिया था? पढ़ें महर्षि गर्ग द्वारा गोकुल में चुपचाप किए गए नामकरण की पौराणिक कथा।

सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के अनेक नाम प्रसिद्ध हैं। गोपाल, गोविंद, मुरलीधर, माखनचोर, देवकीनंदन और यशोदा नंदन, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि संपूर्ण जगत को मोहने वाले मुरलीधर को सबसे पहली बार कृष्ण नाम किसने दिया था? भगवान विष्णु के आठवें अवतार के इस नामकरण के पीछे एक बेहद रहस्यमयी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का नामकरण संस्कार यदुवंश के कुलगुरु महर्षि गर्ग द्वारा गोकुल में बेहद ही गुप्त रूप से कराया गया था, तो आइए पढ़ते हैं इस पावन नामकरण की पूरी कथा।

गोकुल में क्यों हुआ गुप्त नामकरण?

जब मथुरा के राजा कंस के अत्याचार बढ़ गए थे, तब वासुदेव जी ने श्रीकृष्ण को कंस से बचाने के लिए गोकुल में अपने सबसे खास मित्र नंदबाबा और माता यशोदा के पास पहुंचा दिया था। कंस को इस बात की जानकारी न हो कि देवकी की आठवीं संतान गोकुल में पल रही है, इसलिए वासुदेव जी ने यदुवंशियों के कुलगुरु महर्षि गर्ग से प्रार्थना करते हुए कहा कि वे गोकुल जाकर बालक का नामकरण संस्कार करें।

महर्षि गर्ग जब गोकुल पहुंचे, तो नंदबाबा ने अपने दोनों बालकों यानी बलराम और श्रीकृष्ण का नामकरण करने का अनुरोध किया। हालांकि, महर्षि गर्ग ने नंदबाबा को बताया कि अगर कंस को पता चला कि यदुवंश के कुलगुरु ने गोकुल में आकर नामकरण किया है, तो उसे देवकी की आठवीं संतान के जीवित होने का संदेह हो जाएगा। इसलिए, यह नामकरण संस्कार बिना किसी भव्य आयोजन के नंदबाबा की गोशाला में बहुत ही सादगी और गुप्त रूप से किया गया था।

महर्षि गर्ग ने क्यों चुना कृष्ण नाम?

गोशाला में जब महर्षि गर्ग ने नंदबाबा के छोटे बालक को देखा, तो वे उसके तेजस्वी स्वरूप को देखकर हैरान रह गए थे। उन्होंने बालक की ओर देखते हुए कहा -

"आसन वर्णस्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः। शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥"

महर्षि गर्ग ने नंदबाबा को समझाया कि यह बालक हर युग में अवतार लेता है। सत्ययुग में इसका वर्ण श्वेत (सफेद), त्रेतायुग में रक्त (लाल) और द्वापर से पहले पीत (पीला) था। अब इस द्वापर युग में इसने सांवले (काले) वर्ण में अवतार लिया है, इसलिए इसका नाम 'कृष्ण' होगा।

संस्कृत भाषा में कृष्ण शब्द का मतलब काला या सांवला होता है, जबकि इसका दूसरा मतलब आकर्षित करने वाला होता है, जो अपनी ओर पूरे संसार को आकर्षित कर ले और सभी पापों का नाश कर दे, वही कृष्ण हैं।

बलराम जी का नामकरण

इसी अवसर पर महर्षि गर्ग ने रोहिणी के पुत्र का नामकरण भी किया। उन्होंने बताया कि यह बालक अपने बल और गुणों से सभी को हैरान करेगा, इसलिए इसका नाम बलराम होगा। साथ ही, दो परिवारों को जोड़ने के कारण इन्हें संकर्षण भी कहा जाएगा।

नामकरण का महत्व

महर्षि गर्ग ने नंदबाबा को यह भी बताया कि यह बालक गोकुलवासियों को सभी मुश्किलों से बचाएगा, जो भी व्यक्ति इस बालक से प्रेम करेगा, वह जीवन के सभी कष्टों से मुक्त हो जाएगा। इस तरह गोकुल की एक साधारण सी गोशाला में यदुवंश के कुलगुरु गर्गाचार्य जी से कान्हा को अपना सबसे प्रिय नाम 'कृष्ण' मिला, जो आज भी  संपूर्ण जगत में प्रेम, भक्ति और आनंद का प्रतीक माना जाता है।

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