
सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के अनेक नाम प्रसिद्ध हैं। गोपाल, गोविंद, मुरलीधर, माखनचोर, देवकीनंदन और यशोदा नंदन, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि संपूर्ण जगत को मोहने वाले मुरलीधर को सबसे पहली बार कृष्ण नाम किसने दिया था? भगवान विष्णु के आठवें अवतार के इस नामकरण के पीछे एक बेहद रहस्यमयी पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का नामकरण संस्कार यदुवंश के कुलगुरु महर्षि गर्ग द्वारा गोकुल में बेहद ही गुप्त रूप से कराया गया था, तो आइए पढ़ते हैं इस पावन नामकरण की पूरी कथा।
जब मथुरा के राजा कंस के अत्याचार बढ़ गए थे, तब वासुदेव जी ने श्रीकृष्ण को कंस से बचाने के लिए गोकुल में अपने सबसे खास मित्र नंदबाबा और माता यशोदा के पास पहुंचा दिया था। कंस को इस बात की जानकारी न हो कि देवकी की आठवीं संतान गोकुल में पल रही है, इसलिए वासुदेव जी ने यदुवंशियों के कुलगुरु महर्षि गर्ग से प्रार्थना करते हुए कहा कि वे गोकुल जाकर बालक का नामकरण संस्कार करें।
महर्षि गर्ग जब गोकुल पहुंचे, तो नंदबाबा ने अपने दोनों बालकों यानी बलराम और श्रीकृष्ण का नामकरण करने का अनुरोध किया। हालांकि, महर्षि गर्ग ने नंदबाबा को बताया कि अगर कंस को पता चला कि यदुवंश के कुलगुरु ने गोकुल में आकर नामकरण किया है, तो उसे देवकी की आठवीं संतान के जीवित होने का संदेह हो जाएगा। इसलिए, यह नामकरण संस्कार बिना किसी भव्य आयोजन के नंदबाबा की गोशाला में बहुत ही सादगी और गुप्त रूप से किया गया था।
गोशाला में जब महर्षि गर्ग ने नंदबाबा के छोटे बालक को देखा, तो वे उसके तेजस्वी स्वरूप को देखकर हैरान रह गए थे। उन्होंने बालक की ओर देखते हुए कहा -
महर्षि गर्ग ने नंदबाबा को समझाया कि यह बालक हर युग में अवतार लेता है। सत्ययुग में इसका वर्ण श्वेत (सफेद), त्रेतायुग में रक्त (लाल) और द्वापर से पहले पीत (पीला) था। अब इस द्वापर युग में इसने सांवले (काले) वर्ण में अवतार लिया है, इसलिए इसका नाम 'कृष्ण' होगा।
संस्कृत भाषा में कृष्ण शब्द का मतलब काला या सांवला होता है, जबकि इसका दूसरा मतलब आकर्षित करने वाला होता है, जो अपनी ओर पूरे संसार को आकर्षित कर ले और सभी पापों का नाश कर दे, वही कृष्ण हैं।
इसी अवसर पर महर्षि गर्ग ने रोहिणी के पुत्र का नामकरण भी किया। उन्होंने बताया कि यह बालक अपने बल और गुणों से सभी को हैरान करेगा, इसलिए इसका नाम बलराम होगा। साथ ही, दो परिवारों को जोड़ने के कारण इन्हें संकर्षण भी कहा जाएगा।
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