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Janmashtami Vrat Katha 2026: जन्माष्टमी की पौराणिक व्रत कथा, जानें कान्हा के जन्म का रहस्य

Vaishnavi DwivediVaishnavi DwivediUpdated 03 Sep 2026 09:00 AM IST
Janmashtami Vrat Katha 2026: जन्माष्टमी की पौराणिक व्रत कथा, जानें कान्हा के जन्म का रहस्य

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Janmashtami 2026: 4 सितंबर के दिन जन्माष्टमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन कान्हा के जन्म कथा का पाठ करना या सुनना परम मंगलकारी माना जाता है, तो आइए यहां पढ़ते हैं।

भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व मनाया जाता है। इस साल यह महापर्व दिन शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। कहते हैं कि जन्माष्टमी व्रत और पूजन का पूरा फल तभी मिलता है, जब साधक इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्म कथा का पाठ करते या सुनते हैं। ऐसी मान्यता है कि जन्माष्टमी की रात इस कथा को पढ़ने या सुनने से साधक के जीवन के सभी कष्ट, पाप और भय समाप्त हो जाते हैं और घर में सुख, शांति का वास होता है।

श्रीकृष्ण जन्म की चमत्कारी कथा (Janmashtami Vrat Katha)

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, द्वापर युग में मथुरा नगरी पर उग्रसेन का शासन था। उनका पुत्र कंस बहुत अत्याचारी, क्रूर और अहंकारी राजा था। कंस ने अपने पिता उग्रसेन को गद्दी से हटाकर स्वयं मथुरा का सिंहासन हथिया लिया था। कंस की एक बहन थी देवकी, जिससे वह बहुत प्यार करता था। देवकी का विवाह यदुवंशी शूरवीर वासुदेव के साथ संपन्न हुआ। विवाह के बाद जब कंस अपनी बहन देवकी और बहनोई वासुदेव को रथ पर बैठाकर उनकी विदाई कर रहा था, तभी अचानक आकाशवाणी हुई कि हे अहंकारी कंस जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी देवकी की आठवीं संतान तेरा वध करेगी।

यह आकाशवाणी सुनते ही कंस क्रोधित हो उठा और उसने अपनी ही बहन देवकी को मारने के लिए तलवार निकाल ली। तब वासुदेव जी ने शांत भाव से कंस को समझाया कि वे देवकी की हर संतान को जन्म लेते ही उसे सौंप देंगे। कंस ने वासुदेव जी की बात मान ली, लेकिन उसने देवकी और वासुदेव दोनों को मथुरा के कारागार यानी जेल में बंद कर दिया और कड़े पहरे में रख दिया। एक एक करके कंस ने देवकी की छह संतानों को जन्म लेते ही मार डाला। सातवें गर्भ में शेषनाग के अंश आए, जिन्हें भगवान विष्णु की योगमाया ने देवकी के गर्भ से रोहिणी के गर्भ में डाल दिया, जिनसे बलराम जी का जन्म हुआ।

भाद्रपद अष्टमी की मध्यरात्रि और प्रभु का अवतार

इसके बाद भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में, मध्यरात्रि के समय भगवान विष्णु ने स्वयं देवकी के आठवें गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया। भगवान का जन्म होते ही पूरे कारागार में दिव्य प्रकाश फैल गया। भगवान विष्णु ने अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर वासुदेव और माता देवकी को दर्शन दिए और कहा कि हे वासुदेव तुम मुझे तुरंत गोकुल में अपने मित्र नंदबाबा के घर ले जाओ और वहां अभी अभी जन्मी यशोदा की पुत्री योगमाया को लाकर यहां कंस के पास रख दो। भगवान की आज्ञा से वासुदेव जी की सभी बेड़ियां खुल गईं, कारागार के दरवाजे अपने आप खुल गए और सभी पहरेदार सो गए।

यमुना पार कर गोकुल पहुंचना

वासुदेव जी ने बाल श्रीकृष्ण को एक सूप में रखा और मूसलाधार बारिश के बीच गोकुल की ओर निकल पड़े। रास्ते में यमुना नदी भगवान श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श करने के लिए ऊपर उठने लगी। चरण स्पर्श करते ही यमुना जी शांत हो गईं। शेषनाग ने बारिश से बाल गोपाल की रक्षा के लिए अपना छत्र लगा दिया। वासुदेव जी गोकुल पहुंचे, कान्हा को यशोदा जी के पास सुलाया और वहां जन्मी कन्या को लेकर वापस मथुरा के कारागार में आ गए। जैसे ही वासुदेव जी वापस लौटे, जेल के दरवाजे फिर बंद हो गए और पहरेदार जाग गए।

कंस को चेतावनी और कथा का अंत

जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का पता चला, तो वह कारागार पहुंचा। उसने जैसे ही उस कन्या को पत्थर पर पटकना चाहा, वह कन्या हवा में उड़ गई और देवी का रूप धारण करके बोली कि हे मूर्ख कंस मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो गोकुल में जन्म ले चुका है। यह सुनकर कंस डर गया। आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ने कंस द्वारा भेजे गए सभी राक्षसों का वध किया और अंत में पापी कंस का वध करके धर्म की स्थापना की।

कथा का धार्मिक महत्व

जन्माष्टमी पर इस पावन कथा को सुनने से अकाल मृत्यु और भय का नाश होता है। इसके साथ ही यह कथा यह भी संदेश देती है कि जब जब पृथ्वी पर अधर्म और पाप बढ़ता है, तब तब भगवान खुद ही धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं।

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