
सुहागिन महिलाओं के लिए सालभर में आने वाले सभी व्रतों में करवा चौथ का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है। इस दिन हर पत्नी अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाल जीवन के लिए भगवान से प्रार्थना करती और कठिन व्रत का पालन करती है। सूर्योदय से पहले सरगी खाकर शुरू होने वाला यह निर्जला उपवास रात को चंद्रमा के दर्शन और उन्हें अर्घ्य देने के बाद ही पूरा होता है। हर साल महिलाओं के मन में यही सवाल रहता है कि इस बार उनके शहर में चांद कितने बजे निकलेगा और पूजा की सही विधि क्या होगी? ऐसे में आइए जानते हैं करवा चौथ (Karwa Chauth 2026) से जुड़ी सभी जरूरी बातें।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा सती की सुंदर पुत्री वीरावती का विवाह वेद शर्मा नामक योग्य राजकुमार से हुआ था। विवाह के बाद जब वीरावती ने अपने मायके में पहला करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा, तो भूख-प्यास से उसकी तबीयत बिगड़ने लगी। उसकी यह हालत देखकर उसके सातों भाइयों से रहा नहीं गया। भाइयों ने बहन का व्रत तुड़वाने के लिए एक तरकीब निकाली। उन्होंने एक बड़े पीपल के पेड़ के पीछे एक जलती हुई मशाल रख दी और उसके आगे छलनी लगा दी। दूर से देखने पर वह रोशनी बिल्कुल चंद्रमा जैसी लग रही थी। भाइयों ने बहन से कहा कि देखो, चांद निकल आया है, अब तुम इसे देखकर अपना व्रत खोल सकती हो। भोली-भाली वीरावती ने भाइयों की बात मान ली और जैसे ही उसने छलनी से उस रोशनी को देखा, उसे लगा कि सचमुच चंद्रमा निकल आया है। उसने बिना सोचे-समझे पूजा करके व्रत तोड़ लिया, लेकिन जैसे ही उसने भोजन का पहला कौर मुंह में डाला, उसके पति की अचानक मृत्यु की दुखद खबर आ गई। तब वीरावती ने मां पार्वती की प्रार्थना की। मां पार्वती ने उसे पूरी सच्चाई समझाई कि उसने छलनी के पीछे चांद नहीं बल्कि अग्नि की रोशनी को देखकर व्रत तोड़ा था, जिसके कारण यह अनिष्ट हुआ। इसके बाद वीरावती ने पूरे साल हर महीने आने वाली संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा और विधि-विधान से करवा चौथ का व्रत पूरा किया, जिसके प्रभाव से उसके पति को फिर से जीवनदान मिला।
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