
पितृ पक्ष का समय पूर्वजों को समर्पित है। इस दौरान पितरों को प्रसन्न करने, उनका आशीर्वाद पाने और पितृ दोष से मुक्ति के लिए पिंडदान और तर्पण करने का विधान है। अक्सर लोग पिंडदान और तर्पण को एक ही समझ लेते हैं या इन दोनों शब्दों का इस्तेमाल एक साथ करते हैं, जबकि शास्त्रों में इन दोनों क्रियाओं की विधि, सामग्री और धार्मिक उद्देश्य में बहुत बड़ा फर्क बताया गया है। आइए जानते हैं कि पिंडदान और तर्पण में क्या अंतर है?
तर्पण शब्द का सीधा मतलब होता है, तृप्त करना या संतुष्ट करना, जिस प्रकार जल पीकर किसी जीवित व्यक्ति की प्यास शांत होती है, ठीक उसी तरह तर्पण के माध्यम से पितरों की आत्मा को तृप्त किया जाता है।
तांबे के पात्र में शुद्ध जल, गंगाजल, कच्चा दूध, काले तिल और कुश।
हाथ की अंजलि में जल और काले तिल लेकर अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच से जल चढ़ाया जाता है। तर्पण केवल पितरों को ही नहीं, बल्कि देवों, ऋषियों और प्रकृति के सभी प्राणियों को तृप्त करने के लिए दिया जाता है।
तर्पण रोज सुबह स्नान के बाद या दोपहर यानी कि कुतुप काल में किया जा सकता है। इसके लिए किसी पुरोहित की जरूरत नहीं होती है, इसे व्यक्ति खुद भी दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कर सकता है।
पिंडदान दो शब्दों से मिलकर बना है पिंड और दान। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसका शरीर खत्म हो जाता है, लेकिन उसकी आत्मा सूक्ष्म रूप में जीवित रहती है। आत्मा को पितृ लोक की यात्रा करने, अपनी भूख-प्यास शांत करने और मोक्ष प्राप्त करने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है। पके हुए चावल, जौ के आटे, तिल और घी से बने गोल पिंड को जब मंत्रों के साथ पितरों को अर्पित किया जाता है, तो उसी प्रक्रिया को पिंडदान कहते हैं।
जौ का आटा, पके हुए चावल, तिल, घी, शहद, दूध और दूध का मावा मिलाकर गोल-गोल पिंड बनाए जाते हैं।
मंत्रोच्चार के साथ कुश पर इन गोल पिंडों को स्थापित किया जाता है और विधि-विधान से पितरों का आह्वान करके उन्हें अर्पित किया जाता है। पिंडदान मुख्य रूप से असंतुष्ट पितरों को भोजन कराने, उन्हें मोक्ष दिलाने और प्रेत योनि से मुक्त कराने के लिए किया जाता है।
पिंडदान एक विशेष प्रक्रिया है। इसे किसी जानकार पंडित से ही करवाना चाहिए। गया जी, काशी के पिशाच मोचन कुंड या किसी पवित्र नदी के तट पर पिंडदान करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
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