
हिंदू धर्म में भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन आता है। सनातन परंपरा में महिलाओं के लिए इस व्रत का विशेष महत्व बताया गया है। अन्य व्रतों की तरह यह व्रत किसी देवी-देवता की पूजा के लिए नहीं, बल्कि सप्तऋषियों (कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ) के लिए किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महिलाओं के लिए यह व्रत जाने-अनजाने में हुए शारीरिक और मानसिक पापों से मुक्ति पाने का सबसे खास दिन है। आइए जानते हैं कि ऋषि पंचमी (Rishi Panchami 2026) का व्रत महिलाओं के लिए इतना खास क्यों है?
महिलाओं के लिए मासिक धर्म के दौरान कुछ धार्मिक और गृहस्थ नियमों का पालन करना जरूरी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान अनजाने में कुछ चीजों के छुने से मासिक धर्म दोष लग सकता है। ऋषि पंचमी का व्रत इस दोष के प्रभाव को समाप्त करने के लिए किया जाता है।
इस दिन सप्तऋषियों की पूजा करने से शांति और परिवार में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
ऋषि पंचमी के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का विधान है। इस दिन महिलाएं अपामार्ग यानी चिचड़ा नाम के पौधे की जड़ से दातून करती हैं और इसके पत्तों को सिर पर रखकर स्नान करती हैं। यह परंपरा न केवल आध्यात्मिक रूप से शरीर और मन को शुद्ध करती है, बल्कि इसका सेहत की दृष्टि से भी बड़ा आयुर्वेदिक महत्व है।
पौराणिक कथा के अनुसार, विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी सुशीला के साथ रहते थे। उनकी एक पुत्री थी, जो कम उम्र में ही विधवा हो गई। दुखी होकर ब्राह्मण दंपति अपनी पुत्री के साथ गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे। एक दिन सोते समय पुत्री के शरीर में कीड़े पड़ने लगे। यह देखकर उनकी माता बहुत परेशान हुई और उन्होंने अपने पति उत्तंक से इसका कारण पूछा। उत्तंक जी ने ध्यान लगाकर बताया कि पूर्वजन्म में इस कन्या ने मासिक धर्म के दौरान अनजाने में शास्त्रों के नियमों का उल्लंघन किया था और रसोई के बर्तन छू लिए थे। उसी जन्म में इसने ऋषि पंचमी का व्रत भी नहीं किया था, जिसके कारण इसे यह कष्ट भोगना पड़ रहा है।
पिता के कहने पर पुत्री ने भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन पूर्ण निष्ठा से सप्तऋषियों का पूजन किया और ऋषि पंचमी का निर्जला व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से वह सभी पापों से मुक्त हो गई और उसे अगले जन्म में अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई।
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