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Holi 2022 LIVE Updates:होली पर अपनों को ये बेस्ट मैसेज भेजकर करें विश, राशि अनुसार करें रंगों का उपयोग जीवन में आएगा सकारात्मक बदलाव 

Deepa KalraDeepa KalraUpdated 18 Mar 2022 06:41 PM IST
Holi 2022 LIVE Updates:होली पर अपनों को ये बेस्ट मैसेज भेजकर करें विश, राशि अनुसार करें रंगों का उपयोग जीवन में आएगा सकारात्मक बदलाव 

Special Things

LIVE Holi 2022 Puja Vidhi Updates : हर राशि का एक अनुकूल रंग होता है, जो सकारात्मक प्रभाव ला सकता है और इसलिए इसे जानना आपके पक्ष में काम कर सकता है. इस होली आप अपने लकी रंग का उपयोग करते हुए अपने जीवन में सुखद पलों एवं प्रेम को पाने में सफल होंगे. आप अपने साथ साथ दूसरों का जीवन भी रंग से भर सकते हैं आईये जाने आपकी राशि के आधार पर इस होली आपके लिए कौन से रंग शुभदक होंगे.
होलिका दहन 
फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर किया जाता है होलिका दहन। किसी भी पर्व को मनाने के लिए सूर्य उदय पर प्राप्त तिथि को ही मान्यता मिलती है। पर पूर्णमाशि तिथि पर चंद्र पूजन के कारण चंद्रउदय का महत्व है। होलिका दहन के लिए भद्रामुक्त पूर्णिमा तिथि का होना बहुत जरूरी है।भद्रा का वास पृथ्वी पर हो तो मांगलिक और धार्मिक कार्य अशुभ मान्य होते है। यही कारण है की पूर्णिमा तिथि पर होली के पूजन मे भी भद्रा का न होना ही शुभ रहता है।

ज्योतिषी गणना के आधार पर पूर्णिमा तिथि 17 मार्च 2022 को दोपहर 01:29 बजे से शुरू होकर 18 मार्च दोपहर 12:52 मिनट तक रहेगी. जबकि 17 मार्च को ही 01:20 बजे से भद्राकाल शुरू हो जाएगा और देर रात 12:57 बजे तक रहेगा. ऐसे में भद्राकाल होने के कारण शाम के समय होलिका दहन नहीं किया जा सकेगा.   ऐसे में 12:57 बजे भद्राकाल समाप्त होने के बाद होलिका दहन संभव हो सकेगा.
रात के समय होलिका दहन करने के लिए शुभ समय 12:58 बजे से लेकर रात 2:12 बजे तक है. इसके बाद ब्रह्म मुहूर्त की शुरुआत हो जाएगी.

होलिका दहन पर पवित्र अग्नि में कराएं विशेष वस्तु अर्पित, होंगी माँ लक्ष्मी प्रसन्न 
होलिका दहन मुहूर्त्त का शास्त्रीय निर्णय

आज भद्रा के विशेष कारण से होलिका दहन में मत अलग अलग देखने को मिल रहें। एक छोटा से प्रयास द्वारा निराकरण यहाँ किया जा रहा है। होलिका दहन फाल्गुन शुक्लपक्ष की भद्रारहित प्रदोषव्यापिनी पूर्णिमा को ग्राह्य है। धर्मशास्त्र के सूक्ष्म विचार से ज्ञात होता है कि इस वर्ष 17 मार्च 2022 में रात्री अतार्थ 18 मार्च प्रातः 01:09 के पश्चात् ही शुद्धतम होलिका दहन मान्य होगा।

दिनार्धात् परतो या स्यात् फाल्गुनी पूर्णिमा यदि।
रात्रौ भद्रावसाने तु होलिकां तत्र पूजयेत्॥ –भविष्योत्तर
अर्थात् यदि पहले दिन प्रदोष के समय भद्रा हो और दूसरे दिन सूर्यास्त से पहले पूर्णिमा समाप्त हो जाए तो भद्रा के समाप्त होने की प्रतीक्षा करके सूर्योदय होने से पहले रात्रि में होलिकादाह करना चाहिए। 
श्रीजयसिंह कल्पद्रुम में भविष्योत्तरपुराण के उपरोक्त प्रमाण से स्पष्ट लिखा है कि - "यदा तु प्रदोषे पूर्वदिने भद्रा भवति परदिने चास्तात्पूर्वमेव पंचदशी समाप्यते तदा सूर्योदयात्पूर्वं भद्रान्तं प्रतीक्ष्य होलिका दीपनीया।"

 प्राचीन परंपरा रही भी है, देर रात्री भद्रा उतरने पर 2, 3, 5 बजे होलिकादहन सभी ने देखा है, परन्तु आज मनुष्यों की सुविधा का विचार कर शास्त्र के स्पष्ट तथ्यों व परम्परा को त्यागा जा रहा है व प्रमाणाभास के आधार पर सायं भद्रा के समय ही होलिकादहन करने का मिथ्या निर्णय दिया जा रहा है।

होलिका दहन पर पवित्र अग्नि में कराएं विशेष वस्तु अर्पित, होंगी माँ लक्ष्मी प्रसन्न 

भद्रा में होलिकादहन कथमपि शास्त्रसम्मत नहीं है क्योंकि―
भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।
श्रावणी नृपति हन्ति ग्रामं दहति फाल्गुनी॥
― निर्णयसिन्धु
श्रावणी कर्म और फाल्गुनी पूर्णिमा पर होलिकादन भद्रा होने पर नहीं करना चाहिए। भद्रा में श्रावणी करने से राजा की हानि तथा होलिकादहन से ग्राम दहन का भय उत्पन्न होता है।

नन्दायां नरकं घोरं भद्रायां देशनाशनम्।
दुर्भिक्षं च चतुर्दश्यां करोत्येव हुताशनः॥
–विद्याविनोद
प्रतिपदा में होलिकादाह से नरक, भद्रा में होलिकादाह से देशनाश, और चतुर्दशी में करने से दुर्भिक्ष होता है।

प्रतिपद्भूतभद्रासु यार्चिता होलिका दिवा।
संवत्सरं तु तद्राष्ट्रं पुरं दहति साद्भुतम्॥
– चन्द्रप्रकाश
प्रतिपदा, चतुर्दशी, भद्रा और दिन, इनमें होली जलाना सर्वथा त्याज्य है। कुयोगवश यदि जला दी जाए तो वहाँ के राज्य, नगर और मनुष्य अद्भुत उत्पातों से एक ही वर्ष में हीन हो जाते हैं। 

भद्रायां दीपिता होली राष्ट्रभंगं करोति वै।
― पुराणसमुच्चय
भद्रा में होली दाह से राष्ट्रभंग होता है।

अतः उपर्युक्त प्रचुर प्रमाणों से सिद्ध है कि पूर्णिमाव्यापिनी रात्रिपर्यन्त कभी भी भद्रारहित काल मिलने पर भद्रा में होलिका दाह पूर्णतः शास्त्रविरुद्ध एवं अनिष्टकारी है। 

होलिका दहन पर पवित्र अग्नि में कराएं विशेष वस्तु अर्पित, होंगी माँ लक्ष्मी प्रसन्न 

भद्रा पुच्छकाल में होलिका दहन केवल तब ही होता है जब यदि पहले दिन भद्रारहित प्रदोष न मिले, रात्रिभर भद्रा रहे (सूर्योदय होने से पहले न उतरे) और दूसरे दिन सूर्यास्त से पहले ही पूर्णिमा समाप्त हो जाए, तो ऐसे अवसर में सूर्योदय पूर्व भद्रा के पुच्छकाल में होलिकादीपन कर देना चाहिए। 

पर चूँकि भद्राकाल सूर्योदय पर्यन्त व्याप्त नहीं है और रात्रि  पर ही समाप्त हो रहा है अतः रात्री 01:09 से पहले होलिका दहन शास्त्र एवं परम्परा के विरुद्ध होगा। अपनी सुविधा हेतु शास्त्रवचनों का अनादर कथमपि कल्याण का हेतु नहीं है। कुछ पञ्चाङ्ग जो वर्षों तक देर रात्रि में भद्रा के बाद होलिकादहन का मुहूर्त्त लिखते आए हैं वे भी परम्परा त्यागकर भद्रा में ही होलिकादहन करने का अशुद्ध निर्णय दे रहे हैं, अतः पर्व मुहूर्त्त में अत्यन्त सावधानी की आवश्यकता है। 

 अतः 17 मार्च 2022 को देर रात्री अतार्थ 18 मार्च प्रातः 01:09 पश्चात् शास्त्रवचन एवं परम्परासिद्ध उत्तम मुहूर्त्त में होलिकादीपन कर उत्तम शुभफल की प्राप्ति करें। आशा है आप सभी इस मुहूर्त का लाभ लेंगे..

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आज होलिका दहन, जाने धार्मिक महत्व

तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलक: (शब्द कल्पद्रुम कोष) अर्धपक्शमी धान्यैस्तृण भ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेद: कफ दोष श्रमापह। (भाव प्रकाश) अर्थात् - तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है। किसी भी अनाज के ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं- जैसे-चने की पर्त, मटर की पर्त, गेहूँ, जौ का गिद्दी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूँ, जौ की गिदी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते हैं कि वह चनादि का निर्माण करती (माता निर्माता भवति) यदि यह पर्त (होलिका) न हो तो चना, मटर रूपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूँ व जौ भुनते हैं तो वह पर्त या गेहूँ, जौ का ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात् होलिका रूपी पर्त ने अपने को जलाकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया। 

होलिका दहन पर पवित्र अग्नि में कराएं विशेष वस्तु अर्पित, होंगी माँ लक्ष्मी प्रसन्न 
अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है और बसन्त ऋतुओं में नये अन्न से यज्ञ  करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है। हम प्रतिवर्ष होली जलाते हैं, उसमें आखत (अक्षत) डालते हैं, अक्षत चावलों को कहते हैं और अवधि भाषा में आखत को आहुति कहते हैं। कुछ भी हो चाहे आहुति हो, चाहे चावल हों, यह सब यज्ञ की प्रक्रिया है। हम जो परिक्रमा करते हैं यह भी यज्ञ की प्रक्रिया है, हमारी इस प्रक्रिया से सिद्ध होता है कि यहाँ पर प्रतिवर्ष सामूहिक यज्ञ की परम्परा रही होगी, इस प्रकार चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस होली रूपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते थे। हम जो गुलरियाँ (मलरिया) बनाकर अपने-अपने घरों में होली से अग्नि लेकर उन्हें जलाते हैं। यह प्रक्रिया छोटे-छोटे हवनों की है। सामूहिक बड़े यज्ञ से अग्नि ले जाकर अपने-अपने घरों में हवन करते थे। बाहरी वायु शुद्धि के लिए विशाल सामूहिक यज्ञ होते थे और घर की वायु शुद्धि के लिए छोटे-छोटे हवन करते थे।

इस समय सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त कोरोना वायरस के आतंकी भय से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, अच्छा हो कि जब होलिका दहन के लिए जाएं तो अपने साथ शुद्ध कपूर, गौघृत तथा हवन सामग्री भी साथ में लेकर जाएं और परिक्रमा करते हुए आहुतियां समर्पित करते हुए पर्यावरण संरक्षण में भी सहभागिता निभाएं।

पौराणिक कथाओं में हिरण्यकशिपु की बहिन होलिका के जलने तथा प्रह्लाद की रक्षा होने की कहानियां हम सभी जानते हैं। आज पुनः जाति भेद, लिंग भेद तथा भ्रष्टाचार रूपी होलिका का दहन कर मानवता रूपी प्रह्लाद को बचाने की आवश्यकता है। यदि होलिका दहन के समय हम समाज में विषमता की दीवार खड़ी करने वाली होलिका के दहन का संकल्प ले सकें तो होली पर्व मनाना सार्थक हो जायेगा। ईश्वर हम सभी को स्वस्थ, समृद्ध और सुखी बनाए रखें, हमारी प्रभु से प्रार्थना है कि इस होली पर हम सब के जीवन के तमाम अभाव, दिक्कतें, व्याधियाँ, आंधियाँ और परेशानियाँ होलिका के साथ दहन हो जाएं।

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आज पूरे भारत में होलिका दहन की पूजा होगी।  होलिका दहन का शुभ मुहूर्त 9:20 से 10:31 तक रहेगा। यह 1:10 की समय अवधि होगी। इसमें विधि विधान से होलिका दहन करना शुभ रहेगा। होलिका दहन के समय कुछ सावधानियां जरूर बरतनी चाहिए। अन्यथा इससे दुष्प्रभावों से  पूरी ज़िंदगी दुखों का सामना करना पड़ सकता है। आप भी जान लें क्या है वह नियम जिन्हें होलिका दहन के समय जरूर अपनाना चाहिए।

होलिका दहन शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। भद्रा रहित समय होलिका दहन के लिए शुभ माना गया है। अशुभ मुहूर्त में होलिका दहन करने से अशुभ फल प्राप्त होते हैं। होलिका दहन के स्थान को पहले गंगाजल से शुद्ध करना चाहिए और फिर चारो तरफ सूखे उपले, सूखी लकड़ी, सूखी घास के साथ साथ होलिका की मूर्ति भी रखनी चाहिए।  होलिका की विधि विधान से पूजा करें। पूजा में धूप दीप, फूल माला, चावल, काले तिल, कच्चा सूत, जल, पापड़, गन्ना और गेहूं की बालियाँ चढ़ानी चाहिए।  होलिका दहन से पहले हनुमान जी और शीतला माता को प्रणाम करना चाहिए। इसके पश्चात ही होलिका की अग्नि चलानी चाहिए।  होलिका दहन के अगले दिन दुल्हेंडी के पर्व पर जीस स्थान पर होलिका जली थी वहाँ सुबह सुबह एक लोटा ठंडा पानी जरूर डालना चाहिए।  इन सभी बातों का ध्यान होलिका दहन के दिन अवश्य रखना चाहिए।

होलिका दहन पर पवित्र अग्नि में कराएं विशेष वस्तु अर्पित, होंगी माँ लक्ष्मी प्रसन्न 
होलिका दहन की कितनी परिक्रमा लगाना होगा शुभ, जानें अपनी राशि अनुसार। 

पूरे भारत में आज होलिका दहन का पर्व मनाया जाएगा। आज हम आपको बताएंगे कि आप अपनी राशि के अनुसार होलिका दहन की कितनी परिक्रमा लगाएं जो आपके लिए शुभ होंगी।

मेष राशि 
इस राशि के लोगों को होलिका दहन की नौ परिक्रमाएं लगनी चाहिए। साथ ही होलिका दहन में गुड़ की आहुति चढ़ाना अत्यंत शुभ रहेगा। इससे इस राशि के जातकों के जीवन में सुख समृद्धि आएगी।

वृषभ राशि
वृषभ राशि के जातकों को होलिका दहन की 11 परिक्रमा लगानी चाहिए। साथ ही इस राशि के जातक यदि होलिका दहन में मिश्री की आहुति देते हैं तो इससे इनके नौकरी  व व्यवसाय में उन्नति होगी।

अपनी जन्म  कुंडली से जानिये अपनी राशि - फ्री 

मिथुन राशि
मिथुन राशि के जातकों की तो उन्हें होलिका दहन की सात परिक्रमाएं लगानी चाहिए। कहते हैं यदि मिथुन राशि के जातक होलिका दहन में गेहूं की बाली की आहुति चढ़ाते हैं तो इससे उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

कर्क राशि
कर्क राशि वालों का होलिका दहन की अट्ठाईस परिक्रमा लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है। कर्क राशि वाले जातकों को होलिका दहन में सफेद चीजों की आहुति देनी चाहिए जैसे कि सफेद तिल या चावल।

सिंह राशि
सिंह राशि के जातकों की तो उन्हें होलिका की 29 परिक्रमा लगानी चाहिए। यदि सिंह राशि के जातक अपने जीवन से नकारात्मक शक्ति को खत्म करना चाहते हैं और जीवन में नई ऊर्जा का संचार चाहते हैं तो उन्हें होलिका दहन में लोबान की आहुती देनी चाहिए।

कन्या राशि
कन्या राशि के जातकों को होलिका दहन के समय होलिका की सात परिक्रमा लगानी चाहिए। साथ ही होलिका दहन में हरा पान का पत्ता या हरी इलायची की आहुति देनी चाहिए। इससे इस राशि के जातकों के ग्रह नक्षत्र शुभ फल देना आरंभ कर देंगे।

तुला राशि 
तुला राशि के जातकों की तो उन्हें आज के दिन होलिका की 21 परिक्रमा लगानी चाहिए। यदि इस राशि के जातक अपने जीवन में धन संबंधित समस्याओं से छुटकारा चाहते हैं तो उन्हें आज के दिन होलिका दहन में कपूर की आहुति होती देनी चाहिए।

वृश्चिक राशि
वृश्चिक राशि के जातक यदि होलिका दहन की 28 परिक्रमा लगाते हैं और साथ ही होलिका में चने की दाल की आहुति देते हैं तो इससे उनके जीवन में आ रही आर्थिक समस्याओं का अंत हो जाएगा।

अपनी जन्म  कुंडली से जानिये अपनी राशि - फ्री 
होलिका दहन की कितनी परिक्रमा लगाना होगा शुभ, जानें अपनी राशि अनुसार। 

धनु राशि
धनु राशि के जातकों की तो उन्हें आज के दिन होलिका की 28 परिक्रमा लगानी चाहिए। इस राशि के जातक भी होलिका दहन में आज के दिन चने की दाल की आहुति दे सकते हैं। इससे उन्हें शुभफल की प्राप्ति होगी और उनके अटके हुए कार्यों में गति आएगी।

मकर राशि
मकर राशि के जातकों को होलिका दहन की 15 परिक्रमा लगानी चाहिए और साथ ही होलिका दहन में काले तिल की आहुति देनी चाहिए। इससे नकारात्मक चीजें खत्म होंगी और मकर राशि के जातकों के पास अच्छी चीजें आनी आरंभ होंगी।

अपनी जन्म  कुंडली से जानिये अपनी राशि - फ्री 

कुंभ राशि

कुंभ राशि के जातकों को आज होलिका दहन के समय होलिका दहन की 25 परिक्रमा लगानी चाहिए। साथ ही यदि इस राशि के जातक होलिका दहन में काली सरसों की आहुति देते हैं तो यह अत्यंत शुभ फलदायी होगा। इससे इस राशि के जातकों के जीवन में सुख शांति का वास होगा।

मीन राशि
मीन राशि की तो आज होलिका दहन के समय मीन राशि के जातकों को होलिका दहन की नौ परिक्रमा लगानी चाहिए। साथ ही होलिका दहन में पीली सरसों की आहुति देनी चाहिए। ऐसा करने से इस राशि के जातकों के जीवन में समृद्धि आएगी और परिवार में सुख शांति बनी रहेंगी।

होलिका दहन पर पवित्र अग्नि में कराएं विशेष वस्तु अर्पित, होंगी माँ लक्ष्मी प्रसन्न 
होलिका दहन में भूल के भी न करें यह गलतियां :-
  • होलिका दहन सही मुहूर्त पर ही करें। अशुभ मुहूर्त में होलिका दहन करना अशुभ मन जाता है. होलिका दहन हमेशा भद्रा रहित समय में करना चाहिए. 
  • होलिका दहन के स्थान को पहले गंगाजल से शुद्ध करें और फिर डंडा बीच में रखकर उसके चारों ओर सूखे उपले, सूखी लकड़ी, सूखी घास रखें. होलिका की मूर्ति रखें. 
  • विधि-विधान से पूजा करें. पूजा में दीपक, धूप, एक माला, गन्ना, चावल, काले तिल, कच्चा सूत, जल और पापड़ चढ़ाएं. इसके अलावा चावल, चने की झाड़ और गेंहू की बालियां भी डालें.
  • पूजा में हनुमान जी और शीतला माता को प्रणाम करें. इसके बाद अग्नि जलाएं और होलिका दहन करें. 
  • होलिका दहन की अगली सुबह यानी होली खेलने वाले दिन होलिका दहन के स्थान पर एक लोटा ठंडा पानी जरूर डालें.
होलिका दहन पर पवित्र अग्नि में कराएं विशेष वस्तु अर्पित, होंगी माँ लक्ष्मी प्रसन्न 
आज होलिका दहन का पर्व है आज के दिन किए गए उपाय बेहद खास फल देते हैं। आज के दिन किए गए उपाय घर में सुख शांति और समृद्धि लाते है।

होलिका की राख बहुत कारगर मानी गई है। कहते हैं इसकी राख से किए गए उपाय सभी परेशानियों को दूर कर देते हैं।

यदि आप भी आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं तो आज के दिन आपको होलिका की राख अपने घर लानी चाहिए। होलिका की राख को लाल कपड़े में बांधकर अपने पैसे और ज्वेलरी रखने वाले स्थान पर रखें या फिर आप इसकी छोटी सी पोटली बनाकर अपने पर्स में भी रख सकते हैं। इससे आपकी आर्थिक स्थिती में बदलाव होंगे और आपको सकारात्मक परिणाम मिलेंगे।

जानें होली के रंगों से कैसे पाएं लाभ, माता लक्ष्मी हो जाएंगी प्रसन्न। 
आप कोई नया काम करने की सोच रहे है तो आज के दिन आप होलिका की राख से टीका जरूर लगाएं। इससे आपको आपके कार्यों में सफलता मिलेंगे।

आपके घर में झगड़े रहते हैं या फिर क्लेश बना रहता है तो आप आज के दिन एक पोटली में होलिका की राख घर ले आए। इसके बाद किसी अच्छे मुहूर्त में इसे घर के कोने कोने में छिड़क दें। ऐसा करने से आपके घर के झगड़े खत्म होंगे और घर में सुख शांति आएगी।

बच्चों को अक्सर बहुत जल्दी बुरी नजर लग जाती है। आपके घर में भी किसी सदस्य को बहुत जल्द ही नजर लग जाती है या फिर बीमार रहता है।  इसके लिए आप आज होलिका के दहन के बाद होलिका की राख को घर लाए। रात को किसी कपड़े में बांधकर व्यक्ति के सर से सात बार घुमाएं और फिर इस पोटली को मिट्टी में दबा दें। इससे व्यक्ति को लगी नजर उतर जाएगी और बीमार व्यक्ति की तबियत सुधारने लगेंगी।

होलिका दहन पर करें ये 5 उपाय, मिलेगी शनि-राहु-केतु और नज़र दोष से मुक्ति


होलिका दहन में अर्पित करें ये चीज़ें, होंगी सभी मनोकामनाएं पूरी:-

नारियल:

1 पानीदार नारियल लेकर किसी रोगी या पीड़ित व्यक्ति के ऊपर से 7 या 21 बार घड़ी की सूई की दिशा में उतारें या वारें और उसे होलिका की आग में डाल दें। इससे संकट चला जायेगा। नारियल डालने के बाद होलिका की 7 बार परिक्रमा करें और इष्टदेव से प्रार्थना करें। यदि राहु के कारण किसी भी प्रकार का संकट खड़ा हो रहा है तो एक नारियल का गोला लेकर उसमें अलसी का तेल भरें। उसी में थोड़ा सा गुड़ डालें  और इस गोले को जलती हुई होलिका में डाल दें। इससे राहु का बुरा प्रभाव समाप्त हो जायेगा।

जलती होली में नारियल सहित डालें यह 10 चीजें, होंगी सभी मनोकामनाएं पूर्ण
गेहूं की बाली:
होली के दौरान गेहूं की फसल पक जाती है। यही कारण है कि गांवों में होली के अवसर पर फसल और पशु पूजा होती है। होलिका पूजन के लिए गेहूं की बाली की आवश्यकता होती है जिसे होला भी कहते हैं। नए अनाज को होली की अग्नि में अर्पित करने की परंपरा है।नई फसल को सबसे पहले अग्नि के माध्यम से देवताओं को अर्पित करते हैं।

गोबर के कंडे:
होलिका दहन के लिए गोबर के कंडे लगते हैं जो होली के डांडा के आसपास जमाएं जाते हैं। इसी के साथ सात कंडो के बीच में छेद करके उसमें सूत या मूंज का धागा पिरोकर उसे होली में सजाया जाता है जिसे भरभोलियां कहते हैं। होलिका दहन के पहले इसे भाइयों के उपर से वार कर होली की अग्नि में जलाने से भाई के उपर आया संकट हटा जाता है। 

खील बताशे:
माता लक्ष्मी को बताशे प्रिय है। इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आपको समृद्धि का आशीष देती हैं। इससे आपको हर कार्य में अपार सफलता भी मिलेगी। इसे होलिका दहन के दिन आग में डालने से जीवन की हर बाधा स्वाहा हो जाती है।

सिंदूर:
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि किसी लड़की के विवाह में परेशानी आ रही है या कोई महिला अपने पारिवारिक जीवन में बहुत दुखी है तो एक चुटकी सिंदूर लेकर होली की पवित्र अग्नि में डालकर श्रीहरि से प्राथना करें। यह बात किसी को न बताएं।

होलिका दहन पर पवित्र अग्नि में कराएं विशेष वस्तु अर्पित, होंगी माँ लक्ष्मी प्रसन्न 
होलिका दहन पर करें यह उपाय, मिलेगा अधिक लाभ। 

होलिका दहन 17 मार्च को किया जायेगा। इसके अगले दिन रंगों की होली 18 मार्च को खेली जाएगी। होलिका दहन का मुहुर्त इस बार रात 9 बजकर 06 मिनट से रात 10 बजे 16 मिनट तक रहेगा।

1. मान्यता है कि होलिका दहन करने या फिर उसके दर्शन मात्र से भी व्यक्ति को शनि, राहू,केतु के साथ नज़र दोष से मुक्ति मिलती है।
2. माना जाता है कि होली की भस्म का टीका लगाने से नजर दोष तथा प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है।
3. धार्मिक मान्यता के अनुसार , किसी मनोकामना को पूरा करना चाहते हैं तो जलती होली में 3 गोमती चक्र हाथ में लेकर अपनी इच्छा को 21 बार मन में बोलकर तीनों गोमती चक्र को अग्नि में डालकर अग्नि को प्रणाम करके वापस जाएं।
4. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि कोई व्यक्ति घर में भस्म चांदी की डिब्बी में रखता है तो उसकी कई बाधाएं अपने आप दूर हो जाती है।
5.अपने कार्यों में आने वाले बाधा को दूर करने के लिए आटे का चौमुखा दीपक सरसों के तेल से भरकर उसमें कुछ दाने वाले तिल, एक बताशा, सिंदूर और एक तांबे का सिक्का डालकर उसे होली की अग्नि से जलाएं।

होली पर वृंदावन बिहारी जी को चढ़ाएं गुजिया और गुलाल
होलिका दहन से जुड़े कुछ खास तथ्य :-

-प्राचीन काल से ही होलिका की चिता में आग लगाने की परंपरा भद्रा समाप्त होने के बाद ही की जाती रही है। लेकिन अगर हर साल भद्रा का समय एक जैसा न हो तो भद्रा पंच और भद्र मुख के मुहूर्त के बारे में जानना जरूरी है। क्योंकि होलिका दहन भद्रा के समय को ध्यान में रखकर किया जाता है। यदि भद्रा का समय मध्यरात्रि से पहले का हो तो भद्रा पुंछ के मुहूर्त में होलिका जलानी चाहिए।

-होलिका दहन की प्रज्वलित अग्नि की पांच गुना परिक्रमा करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। यह आग ज्वलनशील सामग्री, लकड़ी, गोबर के उपले आदि के उपयोग से जलाई जाती है जिसे कई दिन पहले से इकट्ठा करना शुरू कर दिया जाता है।

-स्थिति कुछ भी हो, इसके लिए भद्रा मुख का समय बहुत ही अशुभ माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इससे मनुष्य के भाग्य का साथ देना बंद हो जाता है और जीवन में दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यदि किसी को इन सभी नियमों के बारे में थोड़ा भी ज्ञान नहीं है, तो ज्योतिष के विद्वान या पंडित की सहायता से पूजा करनी चाहिए।

होली पर वृंदावन बिहारी जी को चढ़ाएं गुजिया और गुलाल

होलिका दहन के दिन किये जाने वाले कुछ खास उपाय। 

-आज होलिका दहन का पर्व है आज के दिन किए गए उपाय बेहद खास फल देते हैं। आज के दिन किए गए उपाय घर में सुख शांति और समृद्धि लाते है। होलिका की राख बहुत कारगर मानी गई है। कहते हैं इसकी राख से किए गए उपाय सभी परेशानियों को दूर कर देते हैं।

-यदि आप भी आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं तो आज के दिन आपको होलिका की राख अपने घर लानी चाहिए। होलिका की राख को लाल कपड़े में बांधकर अपने पैसे और ज्वेलरी रखने वाले स्थान पर रखें या फिर आप इसकी छोटी सी पोटली बनाकर अपने पर्स में भी रख सकते हैं। इससे आपकी आर्थिक स्थिती में बदलाव होंगे और आपको सकारात्मक परिणाम मिलेंगे।

-आप कोई नया काम करने की सोच रहे है तो आज के दिन आप होलिका की राख से टीका जरूर लगाएं। इससे आपको आपके कार्यों में सफलता मिलेंगे।
आपके घर में झगड़े रहते हैं या फिर क्लेश बना रहता है तो आप आज के दिन एक पोटली में होलिका की राख घर ले आए। इसके बाद किसी अच्छे मुहूर्त में इसे घर के कोने कोने में छिड़क दें। ऐसा करने से आपके घर के झगड़े खत्म होंगे और घर में सुख शांति आएगी।

-बच्चों को अक्सर बहुत जल्दी बुरी नजर लग जाती है। आपके घर में भी किसी सदस्य को बहुत जल्द ही नजर लग जाती है या फिर बीमार रहता है।  इसके लिए आप आज होलिका के दहन के बाद होलिका की राख को घर लाए। रात को किसी कपड़े में बांधकर व्यक्ति के सर से सात बार घुमाएं और फिर इस पोटली को मिट्टी में दबा दें। इससे व्यक्ति को लगी नजर उतर जाएगी और बीमार व्यक्ति की तबियत सुधारने लगेंगी।

होली पर बुरी नजर उतारने और बचाव के लिए काली पूजा 
होलिका दहन के दिन बन रहें हैं 3 राजयोग:

17 मार्च 2022 को होलिका दहन,18 मार्च को धुलेंडी और 22 मार्च को रंगपंचमी का पर्व मनाया जाएगा। होलिका दहन के दिन इस बार बन रहें हैं शुभ संयोग, ग्रहों की युति और 3 राज योग देखें समृद्धि। आओ जानते हैं कि कौन से योग संयोग बन रहें हैं।
इस दिन मकर राशि में त्रिगही योग रहेंगे। मकर में शनि, मंगल,और शुक्र की युति रहेगी। कुंभ में बृहस्पति और बुध रहेंगे। ज्योतिष के अनुसार इस दिन वृद्धि योग, अमृत सिद्धि योग, सवार्थ सिद्धि योग के साथ हीं ध्रुव योग का निर्माण हो रहा है। वृद्धि योग में किए गए कार्यों से उस कार्य में वृद्धि हीं रहती है। वहीं सवार्थ सिद्धि योग में किए गए कार्यों में पुण्य प्राप्ति के साथ हीं वह कार्य सिद्ध होता है। ध्रुव योग से चंद्रमा और सभी राशियों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा होली पर इस साल बुध गुरु की युति से आदित्य योग का भी निर्माण हो रहा है।

बन रहें हैं 3 राजयोग:
होलिका दहन वाले दिन गुरु और चंद्रमा की युति से गजकेसरी योग,लग्न , पंचम व नवम भाव में ग्रहों के योग से वरिष्ठ योग और 7 ग्रहों के 4 राशियों में होने से केदार योग बन रहें हैं। ज्योतिष्चार्यो के अनुसार ऐसा दुर्लभ योग पहले कभी नहीं बना जो बहुत हीं शुभ लाभदाई होगा। गुरुवार के दिन इस योग का बना बहुत हीं शुभ है। इसके साथ हीं सूर्य भी गुरु की राशि मीन में रहेंगे।

क्या होगा असर:
गजकेसरी योग से धन समृद्धि में बढ़ोतरी होती होगी और केदार योग से परिवार में सुख, समृद्धि, तरक्की और वैभव की बढ़ोतरी होगी। ऐसी शुभ स्थिति बीमारियों, दुख और कष्टों का नाश करेगी। देश के लिए यह फायदेमंद साबित होगा। देश में खुशहाली बढ़ेगी। व्यापार में भी उछाल रहेगा। नौकरी में लोगों की सैलरी में बढ़ोतरी होगी। मंदी खत्म हो जाएगी। विदेशी निवेश के भी बढ़ने की संभावना है।

होलिका दहन पर पवित्र अग्नि में कराएं विशेष वस्तु अर्पित, होंगी माँ लक्ष्मी प्रसन्न 

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नकारात्मकता को करें दूर 

होली से पुर्व होलिका दहन के दिन को नकारात्मक तत्वों की समाप्ति हेतु और जीवन में सुख समृद्धि के लिए अत्यंत ही शुभ माना गया है और इस समय पर किए जाने वाले उप्याओं द्वारा जीवन में हर प्रकार की नकारात्मकता का नाश होता है. इस दिन होलिका दहन के समय परिवार के सभी लोगों को इस पवित्र अग्नि की परिक्रमा करनी चाहिए ऎसा करने से शरीर में मौजूद सभी प्रकार के दोष समाप्त हो जाते हैं. होलिका दहन की अग्नि और उसके धुएं को घर पर भी घुमाना चाहिए इससे घर की समस्त नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है और रोग दोष भी दूर होते हैं. 

शत्रुओं से मुक्ति पाएं
होलिका दहन के समय पर किया जाने वाला ये उपाय जीवन में शत्रुओं का नाश करने का कारक बनता है. होली की अग्नि में पीली सरसों को अपने ऊपर से फेर कर शत्रु नाम लेकर अग्नि में जोर से डाल देना चाहिए. ऎसा करने से आपके जीवन में जो भी कोई आपका शत्रु होगा उससे आपको मुक्ति प्राप्त होती है. आप शत्रु से किसी भी प्रकार से कष्ट नहीं पाते हैं. 

कारोबार में सफलता के लिए 
अपने कार्य क्षेत्र में सफलता पाने के लिए होली की अग्नि में रात्रि के समय एक सिक्का या 5 गोमती चक्र को अपने हाथों में लेकर होली की अग्नि की परिक्रमा करते हुए ऊं एं क्लीं मंत्र का उच्चारण करें तीन बार परिक्रमा करने के उपरांत उस सिक्के या गोमती चक्र को अग्नि में डाल दीजिए. अगले दिन अग्नि की राख में से सिक्के गोमती चक्र को निकाल कर उसे पानी में प्रवाह दीजिए. ऎसा करने से हर प्रकार की सफलता आप अपने काम के क्षेत्र में अवश्य देख पाएंगे. 

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जानें होलिका दहन की पूजन विधि :-

-आज पूरे भारत मे होलिका दहन किया जायेगा। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त मात्र 1 घंटे 10 मिनट की समयावधि का है। ऐसे मे आपको जानना  आवश्यक है कि होलिका की पूजा कैसे की जाती है।

-होलिका की पूजा के लिए पूजन सामग्री जिसमे की चावल, फूल, हल्दी, मूंग दाल, नारियल के टुकड़े, उपलों की माला, जिसे कुछ जगह बड़कुला या गुलारी भी कहते है सभी को एक थाली में रख ले। साथ ही एक लोटा जल ले लीजिये। 

-होलिका की चार या सात बार परिक्रमा करें और कच्चा सूत होलिका के चारों और बांधे। फिर होलिका पर जल अर्पित करे। 

-इसके बाद होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन के समय कुछ लोग उसकी परिक्रमा भी करते है।

-होलिका दहन मे गेंहू की बालियां भुनी जाती है और बड़ो का आशीर्वाद लेते है।

-होलिका दहन के बाद सभी लोग होली खेलते है और रंग लगाते है। जिसके बाद अगले दिन दुल्हेंडी का पर्व मनाया जाता है।

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इस दिन लोग होलिका की पूजा भी करते है। हिंदू पौराणिक कथाओं में ये माना जाता है कि होलिका पूजा करने से सभी के घर में समृद्धि आती है। लोगों का मानना है कि होलिका पूजा करने के बाद वे सभी प्रकार के भय पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। 

पीपल, बरगद, शमी, आंवला, नीम, आम, केला और बेल की लकड़ियों का प्रयोग होलिका दहन के दौरान कभी नहीं किया जाना चाहिए। हिंदू धर्म में इन पेड़ों को काफी पवित्र और पूज्यनीय माना गया है। 

इनकी पूजा की जाती है और इनकी लकड़ियों का प्रयोग यज्ञ, अनुष्ठान आदि शुभ कार्यों के लिए किया जाता है। होलिका दहन को जलते हुए शरीर का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इस कार्य में इन लकड़ियों का उपयोग नहीं करना चाहिए। 


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होली पर राशि अनुसार करें रंगों का उपयोग जीवन में आएगा सकारात्मक बदलाव 

हर राशि का एक अनुकूल रंग होता है, जो सकारात्मक प्रभाव ला सकता है और इसलिए इसे जानना आपके पक्ष में काम कर सकता है. इस होली आप अपने लकी रंग का उपयोग करते हुए अपने जीवन में सुखद पलों एवं प्रेम को पाने में सफल होंगे. आप अपने साथ साथ दूसरों का जीवन भी रंग से भर सकते हैं आईये जाने आपकी राशि के आधार पर इस होली आपके लिए कौन से रंग शुभदक होंगे. 

मेष राशि
लाल रंग आपके लिए शुभ है, यह रंग ऊर्जा, तीव्रता और पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है जो आपके व्यक्तित्व को परिभाषित करता है. इस होली आपके लिए लाल के अतिरिक्त पीले और श्वेत रंग भी शुभस्थ होंगे. 

वृषभ राशि
इस होली जीवन के सभी पहलुओं में, विशेष रूप से वित्त से संबंधित मामलों में, गुलाबी और सफेद वास्तव में आपके लिए भाग्यशाली होगा. इस होली पर हरा रंग धन और प्रेम का प्रतीक है जो आपके लिए शुभ रंग भी होगा.

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मिथुन राशि
इस होली आपके लिए हल्के पीले और हरे रंग को लगाना अनुकूल होगा, यह आपके जीवन में सकारात्मकता और सफलता लाता है. इसके अलावा, आप गुलाबी और सफेद जैसे रंगों को भी चुन सकते हैं क्योंकि ये आपके लिए भी भाग्यशाली हो सकते हैं.

कर्क राशि
इस होली पर आपके लिए सफेद, ग्रे, सिल्वर और क्रीम रंग बहुत अच्छे होंगे. ये आपके संवेदनशील और प्यारे व्यक्तित्व को दिखाने में आगे होंगे और दूसरों का स्नेह आप को प्राप्त होगा. 

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सिंह राशि
इस होली पर शुभ रंगों में बैंगनी और नारंगी रंग आपके लिए शुभदक होगा. आप इससे साहस और उच्च क्षमता को पाने में सफल होते हैं. ये रंग आपके जीवन में चकाचौंध को भरने वाले होंगे और दूसरों के सामने आपकी उपस्थिति को और बढ़ाते हैं.

कन्या राशि 
इस होली के दिन आपके लिए नीला, हरा, पीला और सफेद रंग भाग्यशाली रंग हैं,यह रंग आपके निजी संबंधों के लिए भाग्यशाली साबित हो सकते हैं.


तुला राशि
इस होली पर आपको चमकीले रंगों का चयन करना चाहिए क्योंकि यह आपके लिए बहुत भाग्यशाली साबित हो सकता है. सुखद रंग जैसे सफेद और हल्का नीला आपके व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाते हैं इसलिए आप ऐसे रंगों का चुनाव कर सकते हैं.

वृश्चिक राशि
इस होली आपके लिए सफेद, लाल और भूरे रंग के सभी रंग आपके लिए शुभ रंग हैं. यह आपको जीवन में दिशा और उद्देश्य खोजने में मदद कर सकते हैं. इनके अलावा, नारंगी और पीला जीवन में व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंधों में भी आपके लिए बहुत फायदेमंद होंगे.

धनु राशि
इस होली आपके लिए गहरा पीला और नारंगी रंग शुभ है, क्योंकि यह आपके आवेगी व्यवहार और मजाकिया व्यक्तित्व को सभी के मध्य प्रसिद्धि दिलाएगा. नीले या फ़िरोज़ा रंग भी भाग्यशाली रंग हैं यह रंग आपकी रक्षा करते हैं.

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मकर राशि
इस होली आपको अपने भाग्यशाली रंगों के रूप में काला, बैंगनी, गहरा भूरा और हरा रंग चुनना चाहिए क्योंकि ये आपके व्यवसाय और कार्य जीवन के लिए अत्यधिक लाभदायक होंगे. ये रंग आपको आर्थिक सफलता देंगे और आपके व्यक्तित्व को निखारने में भी उपयोगी होंगे. 

कुंभ राशि
इस होली आपके लिए हल्के नीले, बैंगनी और सफेद जैसे चमकीले रंग आपको सबसे अच्छे फल दिलाने में सहायक होंगे. ये न केवल अनुकूल हैं, बल्कि ये आपको ऐसे रचनात्मक विचार प्राप्त करने में मदद करते हैं जिनसे आप जीवन में सफलता को पाएंगे. 

मीन राशि
इस होली पर आपके लिए पीला और नारंगी रंग आपके लिए शुभ रहेगा. गुलाबी रंग भी आपके लिए बहुत भाग्यशाली हो सकता है. यह आपको प्रेम और रिश्तों में सफलता दिलाने वाला होगा. 
होला मोहल्ला 

होला मोहल्ला होली उत्सव के समय पर आने वाला एक सिख त्योहार है. चैत्र माह के आरंभ के पहले दिन आता है, जो आमतौर पर मार्च में पड़ता है. यह, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा स्थापित एक परंपरा के अनुसार, होली के रंग रुप से मिलता है यह एक पंजाबी शब्द है जिसका अर्थ है सेना के स्तंभ के रूप में एक संगठित जुलूस. होली के पर्व में जहां लोग एक-दूसरे पर रंग छिड़कते हैं, पानी से होली खेलते हैं इसके विपरित होला मोहल्ला गुरु द्वारा रखी सिखों के शक्ति प्रदर्शन एवं सुरक्षा चक्र को दर्शाने का समय होता है. होला मोहल्ला को सिखों के लिए नकली लड़ाई में अपने शक्ति कौशल, सैन्य संचालन को दिखाने का अवसर होता है. साथ में "होला मोहल्ला" शब्द "नकली लड़ाई" के स्वरुप को दर्शाता है. इस त्यौहार के दौरान, सेना के स्तंभों के रूप में जुलूसों का आयोजन किया जाता है, जिसमें युद्ध-ढोल और निहंग शक्ति वाहक होते हैं, जो एक गुरुद्वारे से दूसरे गुरुद्वारे में जाते हैं और अपने कला कौशल का प्रदर्शन करते हैं.
होला मोहल्ला का आरंभ 
होला मोहल्ला की  प्रथा गुरु गोबिंद सिंह के समय में शुरू हुई, देश-दुनिया में मनाया जाने वाला सिखों का यह पर्व होली के समय पर ही आता है.  सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने इसका आरंभ सिखों के शक्ति एवं सेवा कार्य को समर्पित किया. संस्कृति, पंरपरा और आध्यात्मिकता को एक साथ अपने में समाहित किए हुए यह उत्सव आज देश भर में उल्लास के साथ मनाया जाता है. 

1680 में आनन्दगढ़ साहिब में गुरु गोविन्द सिंह ने इसका स्वयं सुत्रपात किया था  और इसका उद्देश्य सिख  समुदाय को मजबूत शक्ति ओर सच्चे  सेवक के रुप में स्थापित करने का था. कुछ के अनुसार 1701 में आनंदपुर साहिब में इस तरह का पहला कार्यक्रम आयोजित किया गया था. पंजाब के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के रोपड़ जिले में शिवालिक की तलहटी, विशेष रूप से आनंदपुर साहिब के ऐतिहासिक कस्बों के आसपास और कीरतपुर साहिब, स्थान 1701 से होला मोहल्ला की मेजबानी कर रहा है. भारत सरकार ने इसे एक राष्ट्रीय त्योहार का दर्जा दिया.
पंजाब के आनंदपुर साहिब में आयोजित और अब दुनिया भर के अन्य गुरुद्वारों में दोहराया जाने वाला यह वार्षिक उत्सव दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने आनंदपुर साहिब में होली के त्योहार के बाद सैन्य अभ्यास और नकली लड़ाई के लिए सिखों की एक सभा के रूप में शुरू किया था. यह लोगों को वीरता और रक्षा तैयारियों की याद दिलाता है, जो दसवें गुरु को प्रिय थे, जो उस समय मुगल साम्राज्य और पहाड़ी राजाओं से जूझ रहे थे.

तीन दिवसीय होला मोहल्ला 
होला मोहल्ला का उत्सव तीन दिनों तक चलता है . इस तीन दिवसीय भव्य उत्सव पर, नकली लड़ाई, प्रदर्शनियां, हथियारों का प्रदर्शन आदि आयोजित किया जाता है, इसके बाद कीर्तन, संगीत और कविता प्रतियोगिताएं होती हैं. प्रतियोगिताओं में भग लेने वाले लोग साहसी करतब करते हैं, असली हथियारों के साथ नकली मुठभेड़, घुड़सवारी और अन्य प्रकार के बहादुरी के कई अन्य करतब इस दोरान आयोजित किए जाते हैं. 
दरबार में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष कीर्तन और धार्मिक व्याख्यान होते हैं. अंतिम दिन पंज प्यारे के नेतृत्व में एक लंबा जुलूस तख्त केशगढ़ साहिब से शुरू होता है, जो पांच सिख धार्मिक स्थलों में से एक है, और किला आनंदगढ़, लोहगढ़ साहिब, माता जीतोजी जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण गुरुद्वारों से गुजरता है और प्रारंभिक स्थान केशगढ़ साहब पर समाप्त होता है 

आनंदपुर साहिब जाने वाले लोगों के लिए, स्थानीय लोगों द्वारा सेवा के रुप में लंगर का आयोजन किया जाता है. आसपास रहने वाले ग्रामीणों द्वारा गेहूं का आटा, चावल, सब्जियां, दूध और चीनी जैसी कच्ची सामग्री उपलब्ध कराई जाती है. खाना पकाने के लिए स्वयंसेवक भी इसमें भक्ति के साथ शामिल होते हैं ओर सेवा कार्यों में अपना योगदान देते हैं. इस दिन बड़ी संख्या में सिख आज भी आनंदपुर साहिब में इकट्ठा होते हैं और एक प्रभावशाली और रंगीन जुलूस निकाला जाता है, जिसमें निहंग अपने पारंपरिक रूप से हथियारों, घुड़सवारी में अपने कौशल दिखाते हैं. 

होली के रंग शांतिनिकेतन के डोल उत्सव के संग 

होली का त्यौहार जीवन में नए रंगों के आगमन का संदेश लेकर आता है, भारत भर के विभिन्न स्थानों पर होली की अपनी अलग ही छाप दिखाई देती है. इसी के अनेकों रंगों का अलग रुप हमें शांति निकेतन में मनाई जाने वाली होली में भी देखने को मिलता है. रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन में विश्व-भारती विश्वविद्यालय में होली उत्सव में एक नया आयाम जोड़ने का फैसला किया. इस प्रकार, वह इस तरह से त्योहार मनाने का विचार लेकर आया जिसे आज डोल यात्रा या डोल उत्सव के रूप में भी जाना जाता है. इस उत्सव को रवींद्र बसंत उत्सव के रूप में भी जाना जाता है. आज शांतिनिकेतन में "बसंत उत्सव" न केवल विश्व-भारती विश्वविद्यालय का कार्यक्रम या स्थानीय कार्यक्रम नही है, बल्कि एक भव्य उत्सव का समय होता है. होली को हमेशा जीवंत रंगों और उल्लास से परिभाषित किया गया है, इसमें सांस्कृतिक मेलजोल का एक रंगीन दृष्य शांति निकेतन में दिखाई देता है जहां फूलों  की पंखुड़ियों का छिड़काव होली के रंगों को चिह्नित करता है.
बसंत उत्सव बंगाल में भी उल्लास का पर्व है इस दिन वहां के लोगों की सजावट, पोशाक और सामाजिक ताने बाने में रंगों का जिसमें  पीले और लाल रंग का स्पष्ट प्रभुत्व दिखाई देता है. शांति निकेतन की विशिष्ट शैली में बसंत उत्सव की कल्पना सबसे पहले साहित्य कला के पारखी और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी और उन्हीं प्रयास और आशीर्वाद से आज भी यह उत्सव विश्व भारती और रवींद्रभारती विश्वविद्यालय परिसर में एक ही तरीके से मनाया जाता है, और यही पर्व आज शांतिनिकेतन के साथ-साथ बोलपुर क्षेत्रों में और उसके आसपास मनाई जाने वाली होली की विशिष्ट शैली भी बन गया है.
शांतिनिकेतन के बसंत उत्सव की शुरुआत 

बंगाल में बसंत का समय आते ही देश ओर दुनिया भर से लोग एक अलग होली का आनंद लेने के लिए टैगोर की भूमि शांति निकेतन पर आते हैं. जहाँ होली या डोल को बसंत उत्सव के रूप में मनाया जाता है, जहाँ प्रकृति और मानव एक अलग ही मिलन दिखाई देता है. जहां गीत, ताल, नृत्य और पोशाक समय और संस्कृतियों की बाधा को पार करते हुए आत्माओं का मिलन बन जाते हैं. यहां बसंत उत्सव की शुरुआत रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी जिसका संबंध जिसका संबंध उनके सबसे छोटे बेटे, समंदरनाथ से खास रुप से जुड़ा है, जो कि बहुत ही कम उम्र में इस दुनिया को छोड़ कर चले गए थे. 18 जनवरी 1907 को शांतिनिकेतन में 'रितु उत्सव' की शुरुआत की थी. बाद में जब इस उत्सव को मनाया, तो यह बहुत अलग तरीके से शुरू हुआ जहाँ उनके आश्रम के छात्रों ने भाग लिया. यह विरासत अभी भी जारी है, यहां पाठ भवन और विश्व भारती दोनों विभागों के छात्र भाग लेते हैं और कला का प्रदर्शन करते हैं. टैगोर के समय में,इस उत्सव के दिन संगीत गाते थे, उन गीतों की सामूहिक धुनें वसंत का अधिक उत्साह के साथ स्वागत करती प्रतीत होती थी. हर आश्रमवासी इस उत्सव को देखने और उसमें भाग लेने के लिए साल बिथी में इकट्ठा होता था.
डोल पूर्णिमा पर सांस्कृतिक प्रेमियों का आकर्षण होता है शांति निकेतन 

आधिकारिक तौर पर, बसंत उत्सव पहली बार 1920 में शांतिनिकेतन में शुरू हुआ था. आज भी, यह परंपरा अपरिवर्तित बनी हुई है, हालांकि अब के वर्षों से उत्सव में कुछ बदलाव हुए हैं लेकिन उसके बावजूद इसके रंग में कोई बदलाव नही आता है. बैतालिक डोल पूर्णिमा से एक रात पहले होता है अगला बैतालिक अगली सुबह करीब 5 बजे होता है. सुबह 7 बजे के आसपास, विश्व भारती के प्रोफेसर और छात्र विश्वविद्यालय के परिसर में 'खोल दार खोल लागलो जे डोल' गाते हुए नीचे आते हैं, फिर पूरी सभा एक विशेष स्थान पर जाती है जहाँ संगीत और नृत्य का एक सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है. रंग खेला या रंगों के त्योहार की औपचारिक घोषणा भी वहीं से की जाती है. शांतिनिकेतन में होली उत्सव पर भीड़ में कोई अराजकता नहीं होती है. आगंतुकों का स्वागत गालों पर लाल अबीर लगाकर किया जाता है. उत्सव की शुरुआत टैगोर द्वारा होली के एक प्रसिद्ध बंगाली गीत "ऊ रे गृहोबाशी ... खोल द्वार खोल ... लग्लो जे डोल" पर नृत्य के साथ हुई, इसके बाद बच्चों द्वारा "ओरे भाई ... फागुन लेगेचे बोन बोन" और राधा-कृष्ण नृत्य-नाटक प्रस्तुत किए जाते हैं. डोल पूर्णिमा की रात, आमतौर पर हर साल टैगोर का एक नृत्य नाटक किया जाता है. रंगों के इस उदात्त उत्सव में भाग लेने के लिए दुनिया भर से पर्यटक शांतिनिकेतन आते हैं. शांतिनिकेतन में बसंत उत्सव देश और दुनिया भर में आकर्षण का केन्द्र होता है.

कुमाऊं की होली की अपनी सांस्कृतिक विशेषता
जानें होली के दिन कोनसा रंग पहनना होगा शुभ।

होली के दिन सफेद रंग के कपड़े पहने जाते हैं क्योंकि यह चंद्रमा का प्रतीक है। सफेद रंग के कपड़े आपके अंदर विनम्रता और सहनशीलता लाते हैं। होली खेलने के लिए गहरे रंग के कपड़े का उपयोग न करें।

1.हरा: हरा रंग जहां माता दुर्गा और बुध ग्रह का रंग है वही यह माता लक्ष्मी का भी रंग है। यह रंग सौभाग्य का भी माना जाता है। प्राकृति का रंग हरा ही हैं।

2.लाल: लाल रंग माता लक्ष्मी का रंग है। यह मंगलकारी, सौभाग्य, उत्साह, ऊर्जा, हर्ष, सेहत और प्रसन्नता के साथ हीं पराक्रम का भी रंग है।
           लाल टीका शौर्य और विजय का प्रतीक है।

3.पीला: यह रंग ज्ञान और विद्या, सुख, शांति, धन, बुद्धि, समृद्धि, अध्यात्म, शिक्षा, धर्म और देवी देवताओं का रंग है।

4. गुलाबी: गुलाबी रंग को भाग्य, प्रेम और सौभाग्य का सूचक माना जाता है।इस रंग से सकारात्मक वातावरण बनता है।

5. केसरिया: यह धर्म, ज्ञान, त्याग, तपस्या और वैराग्य का रंग है। यह रंग शुभ संकल्प का सूचक है।यह वीरता, बलिदान का भी प्रतीक है।

होली पर वृंदावन बिहारी जी को चढ़ाएं गुजिया और गुलाल। 
होली के दिन इन चीज़ों का दान करने से, सुख-शांति के साथ होगा माता लक्ष्मी का वास।

होली के शुभ अवसर पर यदि आप इन चीज़ों का दान करेंगे, तो आपके जीवन में चली आ रही सभी विपदाएं और संकट दूर होजाएंगे।
चलिए जानते हैं कौनसी हैं वह चीज़ें।

होली के दिन गरीबों और ज़रुरत मंदों की सहायता अवश्य करें। उनको वस्त्र, रंग और भोजन दान करें।
ऐसा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं और आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी करेंगे।

होली के दिन आप गुरु दान दें एवं अपने माता पिता को उपहार दें, ऐसा करने से देवगुरु बृहस्पति प्रसन्न होंगे और अपनी कृपा आप पर बनाये रखेंगे।

होली के दिन गाय की सेवा करें और उनको हरा चारा खिलाएं। ऐसा करने से आपको सभी देवी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होगा और आपके सभी संकट दूर होजाएंगे।

होली के दिन करे यह उपाय, जीवन से सभी विघ्न होगे दूर |

जानें होली के रंगों से कैसे पाएं लाभ, माता लक्ष्मी हो जाएंगी प्रसन्न।


होली के त्योहार रंग,नृत्य और गान का त्योहार है। इसमें रंगों का खास महत्व रहता है। रंगों का हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। होली पर ज्योतिष और वास्तु के अनुसार करें रंगों का उपयोग तो बहुत हीं लाभ होगा। तो आइए जानते हैं ज्योतिष होली के रंगों के बारे में क्या कहता है।

रंगोली:
होली के दिन होलिका दहन के आसपास और घर के बाहर रंगोली बनाने का प्रचलन है। होली का डांडा जहां गाड़ा जाता है वहां और घर के द्वार के बाहर और भीतर रंगोली बनाते हैं। रंगोली बनाने के लिए पीला,गुलाबी,हरा,और लाल रंग का उपयोग करें क्योंकि ये रंग मां लक्ष्मी को प्रिय है। इससे उनकी कृपा बनी रहेगी और घर का वास्तु दोष भी दूर होगा।

गृह दोष दूर करने हेतु:
गह दोष दूर कर घर में पॉजिटिव शक्ति बढ़ाने के लिए होली के दिन घर के बाहर हमें हल्के नीले, सफेद, पीले, नारंगी, क्रीम आदि लाइट रंगों का उपयोग करना चाहिए परंतु घर के भीतर हर कमरें और उसकी दीवारों का रंग तो वास्तु अनुसार हीं चयन करना चाहिए, क्योंकि रंगों का हमारे जीवन पर बहुत ज्यादा असर होता है।

गृह दिशा:
होली के दिन घर की दिशा के अनुसार गुलाल या रंगों का उपयोग करें । जैसे यदि आपका मकान पूर्वमुखी है तो लाल,हरा,गुलाबी, नारंगी रंग का उपयोग करें। इससे घर में सुख समृद्धि बनी रहेगी। यदि उत्तरमुखी भवन है तो आसमानी,पीला,और नीले रंग का प्रयोग कर सकते हैं। इससे घर में उन्नति और नए अवसरों को बढ़ावा मिलेगा।


इस होली भेजें अपने दोस्तों एवं रिश्तेदारों को ये खूबसूरत सन्देश।
जानिए देश के विभिन्न राज्यों में कैसे मनाई जाती है होली। 

होली का पर्व पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सभी जगह अपने सांस्कृतिक परिवेश के अनुसार यह पर्व मनाया जाता है। कई जगह की होली काफी प्रसिद्ध हैं। इस बार होली पर लॉन्ग वीकेंड की छुट्टियां मिल रही है।

यदि ऐसे में आप भी कर रहे है प्लान होली पर कही बहार जाने का तो आज हम आपको कुछ जगहों की होली के बारे में बताएंगे जहाँ की होली काफी प्रसिद्ध है। इन जगहों पर होली मनाने लोग दूर दूर से आते हैं।

जानें उदयपुर में कैसे मनाई जाती है होली-

 यदि आप भी शाही अंदाज में होली मनाने की सोच रहे हैं।  तो आपको उदयपुर जरूर जाना चाहिए। यहाँ पर होली की पूर्व संध्या पर खास तरह से होली मनाई जाती है जिसे शाही होली कहते हैं। यहाँ पर होली बिलकुल शाही अंदाज में सेलिब्रेट की जाती है।
इस दौरान शाही निवास से मानिक चौक तक शाही जुलूस निकलता है। इस जुलूस में घोड़े, हाथी से लेकर शाही बैंड भी शामिल होता है जिसे यह एक अलग ही पहचान दे देता है। यदि आप भी यहाँ आना चाहते हैं तो आप रेल या हवाई मार्ग का सफर करके आ सकती है।
जानें कलकत्ता में कैसे मनाई जाती है होली-

कलकत्ता से करीब 150 किलोमीटर दूर बीरभूम में स्थित शांति निकेतन की होली भी काफी प्रसिद्ध है। कहते है इसकी स्थापना रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने की थी। यह होली विश्व भारती यूनिवर्सिटी में खेली जाती है। यहाँ पर छात्र आने वाले सैलानियों के लिए विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करते हैं और उनके साथ होली खेलते हैं। इस त्योहार की बंगाल की संस्कृति में एक खास अहमियत है। यदि आप भी इस बार होली को एन्जॉय करना चाहते हैं तो। यह स्थान आपके लिए बिल्कुल उचित है


जानें बरसाने में कैसे मनाई जाती है होली-

बरसाने की लठमार होली और वृंदावन की फूलों वाली होली भक्तों के बीच काफी प्रसिद्ध है। इतना ही नहीं इन दोनों होलियों का आनंद लेने देश विदेश से लोग आते हैं। बरसाने की लठमार होली की शुरुआत होली से एक सप्ताह पहले हो जाती है वही मथुरा वृंदावन में खेली जाने वाली फूलों की होली की शुरुआत रंगभरी एकादशी से हो जाती है और फिर एक सप्ताह तक यह होली खेली जाती है। यह होली वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में खेली जाती है इसमें भक्त गुलाल के साथ साथ फूलों की पंखुड़ियों का इस्तेमाल करते हैं।

अपनी जन्म  कुंडली से जानिये अपनी राशि - फ्री 
लठमार होली से जुड़ी एक पौराणिक कथा-

हिन्दू धर्म मे यू तो पूरे वर्ष कई त्योहार आते है। सभी पर्वो की अपनी विशेष मान्यता और महत्व है। वही सभी पर्वो को मनाने के कारण भी है। साथ साथ सभी पर्व मानव समाज को कोई न कोई सीख देते है। जिससे मनुष्य अपने जीवन और समाज को बेहतर बना सकता है। लेकिन होली और दीपावली यह दोनों पर्व हिन्दुओ के सबसे बड़े पर्व माने जाते है। वैसे तो हिन्दू सभी पर्व पूरी श्रद्धा और हर्षउल्लास के साथ मनाते है। यह दोनों पर्व पूरे भारत मे सभी लोग बड़े हर्षउल्लास के साथ मनाते है।

सभी जगह इनकी छटा देखते बनती है। बात करे होली की तो इस वर्ष यह त्योहार 17 और 18 मार्च को बनाया जायेगा। होली का पर्व भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी से जुड़ा है। कहते है इस पर्व का आरंभ द्वापर योग में स्वयं राधा रानी और श्री कृष्ण ने खेल कर आरम्भ किया था। यही कारण है कि मथुरा, वृंदावन और बरसने मे इस दिन का विशेष महत्व होता है। यहां पर तो यह त्योहार कई दिन पहले से आरंभ हो जाता है।मथुरा और बरसने में भिन्न भिन्न होली खेली जाती है जिसमे से सबसे महत्वपूर्ण है लट्ठमार होली। किसी ने देखी हो या न देखी हो नाम सभी ने सुना होगा। कहते है यह होली देखने सिर्फ भारत से ही नही बल्कि देश विदेश से लोग बरसने जाते है।
लट्ठमार होली सबसे पहले राधा और कृष्ण ने खेली थी। इसके पीछे की पौराणिक कथा आपको बताते है। कहते है कि कृष्ण जी अपने सखाओं के साथ राधा जी और उनकी सखियों को परेशान करने बरसाने जाया करते थे। तब एक बार होली के अवसर पर राधा रानी और उनकी सखियों ने योजना बनाई और वह सभी लट्ठ लेकर खड़ी हो गयी जब कान्हा और उनके सखा उन्हें रंग लगाने पहुँचे तो राधा और उनकी सखियों ने उनपर लट्ठ मारने आरम्भ कर दिए। जिनसे बचने के लिए कान्हा और उनके सखाओं ने ढाल की सहायता ली। तभी से यह लट्ठमार होली की परंपरा चली आ रही है। इस होली महिलाये पुरुषों पर लट्ठ मारती है और पुरुषों को ढाल से उनके लट्ठ की मार से बचना होता है।इसलिए इसे लट्ठमार होली कहते है।


कुमाऊं की होली की अपनी सांस्कृतिक विशेषता

होली में रंगों का महत्व। 


होली का पर्व रंगों का पर्व है। इस दिन सभी लोग अबीर और गुलाल से होली खेलते हैं। बाज़ारों में अलग अलग रंग का गुलाल मिलता है। जिनमें से पांच रंगों का गुलाल सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है वह हैं लाल, पीला, हरा, गुलाबी और नीला। आज हम आपको इन पांच रंगों का महत्व बताएंगे।

सबसे पहले बात है लाल रंग की, लाल रंग को अग्नितत्व का प्रतीक माना जाता है। सभी शुभ कार्यों में इसका प्रयोग होता है। लाल रंग उत्साहवृद्धि, गर्मी और जोश से जोड़कर देखा जाता है। यदि आप लाल रंग का प्रयोग होली के मौके पर करते हैं तो आपके धन में वृद्धि होती है और आपके अंदर ऊर्जा का संचार होता है।
होली के गुलालो में पीले रंग उसका भी काफी इस्तेमाल होता है। पीले रंग को प्रकृति, अध्यात्म और ज्योति से जोड़कर देखा जाता है।  देखा गया है कि जब मनुष्य पीले रंग की ओर देखता है तो आँखों के साथ साथ उसके मन और मस्तिष्क को भी शांति प्राप्त होती है। कहते हैं यदि आप होली पीले रंग के गुलाल से खेलते हैं तो आपको आरोग्य, ऐश्वर्य और यश की प्राप्ति होती है।

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अब बात करते हैं नीले रंग की, नीला रंग जल और आकाश का रंग है। जिसके चलते यह रंग शीतलता और स्थिरता का प्रतीक है। नीला रंग शांति और गंभीरता प्रदान करता है। यदि आप नीले रंग के गुलाल से होली खेलते हैं तो इससे शनि के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और साथ ही यह रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है। गुलाबी रंग सभी को बहुत अच्छा लगता है क्योंकि यह आकर्षण का प्रतीक माना गया है। कहते हैं यदि प्रेमी और प्रेमिका, पति और पत्नी गुलाबी रंग से होली खेलते हैं तो इससे उनके बीच प्यार बढ़ता है और साथ ही रिश्तों की डोर भी मजबूत होती है।
अब बात करे हरे रंग की तो हरा रंग बहुत ही खास रंग माना गया है। हरा रंग शांति, संपन्नता और जीवन का प्रतीक माना गया है। हरा रंग प्रकृति का रंग है। जिस प्रकार हर ओर हरियाली देखकर मन को सुकून मिलता है उसी प्रकार हरे रंग के गुलाल से होली खेलने से मन को सुकून मिलता है और सुख समृद्धि भी प्राप्त होती है।
होली की पौराणिक कथा-
 आज हम आपको होली क्यों मनाई जाती है और इससे जुड़ी पौराणिक कहानी आपको बतायेंगे। कहते है हिरण्यकश्यप प्राचीन भारत में एक राजा था जो एक दानव की तरह था। वह अपने छोटे भाई की मृत्यु का बदला लेना चाहता था जिसे भगवान विष्णु ने मार दिया था। इसलिए सत्ता पाने के लिए राजा ने वर्षों तक प्रार्थना की। अंत में उन्हें एक वरदान दिया गया। लेकिन इसके साथ ही हिरण्यकश्यप खुद को भगवान मानने लगा और अपने लोगों से उसे भगवान की तरह पूजने को कहा।
क्रूर राजा का प्रहलाद नाम का एक जवान बेटा था, जो भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था। प्रहलाद ने कभी अपने पिता के आदेश का पालन नहीं किया और भगवान विष्णु की पूजा करता रहा। राजा इतना कठोर था कि उसने अपने ही बेटे को मारने का फैसला किया, क्योंकि उसने उसकी पूजा करने से इनकार कर दिया था।इसके बाद हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका से पूछा, जो आग से प्रतिरक्षित थी, उसकी गोद में प्रहलाद के साथ अग्नि की एक चिता पर बैठना था। उनकी योजना प्रहलाद को जलाने की थी। लेकिन उनकी योजना प्रहलाद के रूप में नहीं चली, जो भगवान विष्णु के नाम का पाठ कर रहे थे, सुरक्षित थे, लेकिन होलिका जलकर राख हो गई। इसके बाद, भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध किया। इसलिए हर वर्ष होलिका जलाई जाती है और अगले दिन हिरण्यकश्यप जैसे क्रूर राजा से आजादी मिलने पर प्रजा खुशी मनाती है और एक दूसरे को रंग लगाती है।
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