
संतान की लंबी उम्र और अच्छी सेहत के लिए रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत माताओं के लिए सबसे खास व्रतों में से एक है। कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पावन पर्व पर माताएं दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत की एक सबसे बड़ी और अनोखी बात यह होती है कि इसमें करवा चौथ की तरह रात को चांद का इंतजार नहीं किया जाता, बल्कि आसमान में तारे देखकर इस व्रत को खोला जाता है। कई लोगों के मन में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर अहोई अष्टमी पर चांद की बजाय तारों को देखने का क्यों विधान है और इसके पीछे क्या धार्मिक वजह है? आइए इसके पीछे का रहस्य जानते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके पीछे दो मुख्य वजहें जुड़ी हुई हैं -
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से तारों और शाम के समय की पूजा से जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन माताएं अपनी संतान को आकाश के चमकते हुए तारों की तरह दीर्घायु और स्थिर मानती हैं। तारे स्थिरता और लंबी उम्र के प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए तारों को देखकर व्रत का पारण किया जाता है।
करवा चौथ का व्रत पति की लंबी उम्र के लिए होता है, जिसमें चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। वहीं, अहोई अष्टमी का व्रत संतान के लिए होता है। संतान को आसमान के चमकते हुए तारों के समान तेजस्वी देखा जाता है, इसलिए इस दिन तारों को देखकर ही जल ग्रहण किया जाता है।
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