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Ahoi Ashtami 2026: अहोई अष्टमी पर चांद नहीं, तारों को देखकर क्यों खोला जाता है व्रत? जानें खास वजह

Vaishnavi DwivediVaishnavi DwivediUpdated 31 Oct 2026 12:00 PM IST
Ahoi Ashtami 2026: अहोई अष्टमी पर चांद नहीं, तारों को देखकर क्यों खोला जाता है व्रत? जानें खास वजह

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Ahoi Ashtami 2026 Moon And Star Sighting: अहोई अष्टमी के व्रत में चांद की बजाय तारों को देखने की परंपरा क्यों है? जानिए इसके पीछे की धार्मिक मान्यता, पूजा के नियम और व्रत की सरल विधि।

संतान की लंबी उम्र और अच्छी सेहत के लिए रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत माताओं के लिए सबसे खास व्रतों में से एक है। कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पावन पर्व पर माताएं दिनभर निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत की एक सबसे बड़ी और अनोखी बात यह होती है कि इसमें करवा चौथ की तरह रात को चांद का इंतजार नहीं किया जाता, बल्कि आसमान में तारे देखकर इस व्रत को खोला जाता है। कई लोगों के मन में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर अहोई अष्टमी पर चांद की बजाय तारों को देखने का क्यों विधान है और इसके पीछे क्या धार्मिक वजह है? आइए इसके पीछे का रहस्य जानते हैं।

अहोई अष्टमी पर तारों को देखकर व्रत क्यों खोला जाता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके पीछे दो मुख्य वजहें जुड़ी हुई हैं -

कार्तिक माह और चंद्रमा का संबंध

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से तारों और शाम के समय की पूजा से जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन माताएं अपनी संतान को आकाश के चमकते हुए तारों की तरह दीर्घायु और स्थिर मानती हैं। तारे स्थिरता और लंबी उम्र के प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए तारों को देखकर व्रत का पारण किया जाता है।

करवा चौथ और अहोई अष्टमी का अंतर

करवा चौथ का व्रत पति की लंबी उम्र के लिए होता है, जिसमें चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। वहीं, अहोई अष्टमी का व्रत संतान के लिए होता है। संतान को आसमान के चमकते हुए तारों के समान तेजस्वी देखा जाता है, इसलिए इस दिन तारों को देखकर ही जल ग्रहण किया जाता है।

अहोई अष्टमी की पूजा और व्रत खोलने की सरल विधि

  • शाम के समय दीवार पर गेरू या हल्दी से अहोई माता का चित्र बनाया जाता है। उनके साथ सेही और उसके बच्चों का चित्र भी होना जरूरी है।
  • माता को चावल और दूध या हलवे का भोग लगाया जाता है। पूजा में चांदी की अहोई की भी पूजा की जाती है।
  • शाम के समय जब आसमान में तारे निकल आते हैं, तब महिलाएं छलनी या बिना छलनी के तारों के दर्शन करती हैं। इसके बाद जल से भरे लोटे से तारों को अर्घ्य देती हैं और अपनी संतान की खुशहाली की कामना करती हैं।
  • तारों को देखने और अर्घ्य देने के बाद, माताएं अपने बच्चों के हाथों से जल पीकर या मीठा खाकर अपना निर्जला उपवास खोलती हैं।

अहोई अष्टमी की पौराणिक कथा 

कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी। दीपावली के लिए मिट्टी लाने के दौरान साहूकार की बहू से अनजाने में खदान की मिट्टी खोदते समय 'सेही'के बच्चे को चोट लग गई, जिससे उसकी मौत हो गई। इससे दुखी होकर सेही ने उसे शाप दिया कि जैसे उसके बच्चे की मौत हुई है, वैसे ही उसके गर्भ से होने वाले बच्चों का भी नाश होगा। इस श्राप के कारण साहूकार की बहू के जो भी बच्चे होते, वे सात दिन के भीतर मर जाते। दुखी होकर उसने किसी बड़े पंडित की सलाह पर 'अहोई माता'की से क्षमा मांगते हुए व्रत किया। उसकी सच्ची भक्ति को देखकर अहोई माता प्रसन्न हुईं और उसे अखंड संतान सुख का आशीर्वाद दिया। तभी से संतान की रक्षा के लिए यह व्रत रखा जाने लगा।

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