
सनातन धर्म में भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है। इसे भाद्रपद अमावस्या, कुशोत्पाटिनी अमावस्या और पिठोरी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन धार्मिक अनुष्ठानों के लिए साल भर इस्तेमाल की जाने वाली कुश तोड़ी जाती है। इसके साथ ही यह तिथि पितरों की तृप्ति, तर्पण और पिंड दान के लिए बेहद कल्याणकारी मानी गई है। वैदिक पंचांग को देखते हुए इस साल भाद्रपद अमावस्या दो दिन मनाई जाएगी।
शास्त्रों में स्नान-दान, पिठोरी व्रत और पितृ तर्पण के लिए अलग-अलग दिनों का महत्व बताया गया है। आइए समझते हैं कि किस दिन कौन सा काम करना सही रहेगा?
पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, इसका समापन 11 सितंबर को सुबह 08 बजकर 56 मिनट पर होगा। इस बार 10 और 11 सितंबर दोनों ही दिन अमावस्या का प्रभाव रहेगा। इसलिए अलग-अलग धार्मिक कामों के लिए दोनों ही दिनों का अपना महत्व है।
भाद्रपद अमावस्या को पिठोरी अमावस्या भी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार, पिठोरी व्रत और पूजन के लिए प्रदोषव्यापिनी अमावस्या का महत्व माना गया है। 10 सितंबर की शाम को अमावस्या तिथि रहेगी, इसीलिए पिठोरी देवी, सप्तमातृका और 64 योगिनियों की पूजा 10 सितंबर की शाम को ही की जाएगी।
पितृ काम, स्नान-दान और श्राद्ध कर्म के लिए सूर्योदय के समय अमावस्या का होना जरूरी होता है। 11 सितंबर को सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि रहेगी। इसलिए भाद्रपद अमावस्या का पवित्र नदियों में स्नान, दान और पितृ तर्पण करना 11 सितंबर को ही अच्छा माना जाएगा।
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