
भाद्रपद और आश्विन माह का समय पितरों की तृप्ति और उनकी आत्मा की शांति के लिए समर्पित होता है। वैसे तो पूरे भारत में पितृ पक्ष के दौरान तर्पण और पिंड दान के लिए कई पवित्र तीर्थ हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के काशी में स्थित पिशाच मोचन कुंड (Pisach Mochan Kund) का अपना एक अनूठा और बेहद ही प्रभावशाली धार्मिक महत्व है। ऐसा माना जाता है कि अगर किसी के परिजन की अकाल मृत्यु हुई हो, परिवार में लंबे समय से पितृ दोष या फिर संतान से जुड़ी परेशानियां चल रही हों, तो काशी के पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध (Tripindi Shradh) कराने से इन सभी कष्टों का अंत हो जाता है। तो आइए काशी के इस पावन तीर्थ की महिमा और त्रिपिंडी श्राद्ध से जुड़ी प्रमुख बातें जानते हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार, एक कपर्दी नाम का पिशाच था, जो मुक्ति की तलाश में काशी पहुंचा। उसने भगवान शिव की घोर तपस्या की और इस कुंड के जल में स्नान किया। उसकी भक्ति और कुंड की पवित्रता से प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उसे पिशाच योनि से मुक्ति दे दी और वरदान दिया कि जो भी व्यक्ति इस कुंड में स्नान करके अपने पितरों के लिए तर्पण या त्रिपिंडी श्राद्ध करेगा, उसके तीन पीढ़ियों के नाराज पितृ और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पूर्वज पिशाच योनि से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होंगे। तभी से इस कुंड का नाम पिशाच मोचन कुंड पड़ा।
सामान्य श्राद्ध में केवल तीन पीढ़ियों के पितरों का तर्पण किया जाता है, लेकिन जब किसी व्यक्ति के परिवार में पूर्वजों की आत्मा असंतुष्ट रह जाती है या किसी की अकाल मृत्यु हो जाती है, तो वे प्रेत योनि में चले जाते हैं। ऐसे असंतुष्ट पितरों की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। इसमें तीन देवताओं का आह्वान किया जाता है।
ऐसा कहा जाता है कि त्रिपिंडी श्राद्ध करने से जिन पितरों की अकाल मृत्यु हुई होती है, उनकी आत्मा को शांति मिलती है। इसके साथ ही अगर किसी के कुंडली में भारी पितृ दोष है, जिसके कारण बनते काम बिगड़ रहे हों या आर्थिक तंगी बनी रहती हो, तो इस कुंड पर तर्पण करने से तुरंत राहत मिलती है। ये भी कहते हैं कि बिहार के गया जी में पिंड दान करने से पहले काशी के पिशाच मोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध करना बहुत जरूरी होता है।
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