Simhastha Kumbh Mela 2026 Start: नासिक और त्र्यंबकेश्वर में सिंहस्थ कुंभ मेले का शुभारंभ हो चुका है। जानिए ग्रहों की किस खास चाल पर आधारित है यह महाकुंभ और इसका धार्मिक महत्व?
हिंदू धर्म में कुंभ मेले को बेहद पावन माना गया है। दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक समागमों में से एक सिंहस्थ कुंभ मेले की शुरुआत आज यानी 31 अक्टूबर 2026 को पारंपरिक धर्म ध्वजारोहण के साथ हो रही है। महाराष्ट्र के पवित्र शहरों नासिक और त्र्यंबकेश्वर में गोदावरी नदी के तट पर आयोजित होने वाले इस महाकुंभ को लेकर देश-विदेश के साधु-संतों और श्रद्धालुओं में भारी उत्साह है। आइए जानते हैं कि सिंहस्थ कुंभ का यह पर्व क्यों खास है और इसके पीछे का ज्योतिषीय गणित क्या कहता है?
सिंहस्थ कुंभ अमृत स्नान तिथि
ध्वजारोहण: 31 अक्टूबर 2026
नगर प्रदक्षिणा: 29 जुलाई 2027
पहला अमृत स्नान: 2 अगस्त 2027
दूसरा अमृत स्नान: 31 अगस्त 2027
तीसरा अमृत स्नान (नासिक): 11 सितंबर 2027
तीसरा अमृत स्नान (त्र्यंबकेश्वर): 12 सितंबर 2027
समापन समारोह: 24 जुलाई 2028
क्या है सिंहस्थ कुंभ का ज्योतिषीय गणित?
कुंभ मेलों का पूरा आयोजन ज्योतिषीय गणना पर टिका होता है। सूर्य, गुरु और चंद्रमा की स्थिति तय करती है कि कुंभ किस नदी के तट पर और किस शहर में लगेगा।
सिंह राशि में गुरु का प्रवेश: जब बृहस्पति सिंह राशि में और सूर्य मेष राशि में होता है, तब इन स्थानों पर सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया जाता है, तब महाराष्ट्र के नासिक और त्र्यंबकेश्वर में 'सिंहस्थ कुंभ' का योग बनता है।
गोदावरी का पावन तट: नासिक में गोदावरी नदी के तट पर और त्र्यंबकेश्वर में कुशावर्त कुंड पर यह मेला लगता है। बृहस्पति हर 12 साल में एक बार सिंह राशि में आते हैं, इसलिए ठीक 12 साल के अंतराल पर नासिक में सिंहस्थ कुंभ का आयोजन होता है।
सिंहस्थ कुंभ मेले का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुंभ के दौरान पवित्र नदियों में स्नान करने से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
शाही स्नान: इस भव्य आयोजन के दौरान कई मुख्य तिथियों पर 'अमृत स्नान' होते हैं, जिसे शाही स्नान भी कहा जाता है। इसमें देश के सभी अखाड़ों के साधु-संत और महामंडलेश्वर पूरी भव्यता के साथ गोदावरी में डुबकी लगाते हैं। उनके स्नान के बाद सभी के लिए घाट खोल दिए जाते हैं।
सकारात्मक ऊर्जा: ऐसा माना जाता है कि कुंभ काल के दौरान ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है कि पवित्र नदियों के जल में विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा समा जाती है। इस दौरान दान-पुण्य, जप और ध्यान करने से कई गुना शुभ फल की प्राप्ति होती है।