Logo

तिथि

अपने दिन की शुरुआत आज के शुभ मुहूर्त के साथ करें

Locationस्थान
20/08/2026
Swastik

TITHI

तिथि
अष्टमी
प्रारंभ:19 Aug, 07:20 PM
समाप्त :20 Aug, 09:18 PM
तिथि
नवमी
प्रारंभ:20 Aug, 09:18 PM
समाप्त :21 Aug, 11:36 PM

तिथि क्या है? – आज की तिथि, अर्थ, प्रकार और पंचांग में महत्व

तिथि चंद्रमा के दिन को सूचित करती है और यह सूर्योदय के समय चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करती है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि तिथि उस चंद्रमा की अवस्था को दर्शाती है जो दिन की शुरुआत में प्रमुख होती है।

आज की तिथि (Aaj Ki Tithi)

पंचांग, जो एक धार्मिक और काल गणना का उपकरण है, यह स्पष्ट करता है कि सूर्योदय के समय सक्रिय तिथि कब समाप्त होती है। यानी, हर दिन की शुरुआत में चंद्रमा की जिस स्थिति के आधार पर तिथि निर्धारित की जाती है, वह दिन के दौरान बदलती रहती है।

इस प्रक्रिया में, चंद्रमा की कलाएं (चंद्रमा के घटने और बढ़ने के चरण) महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उदाहरण के लिए, जब चंद्रमा का आकार बढ़ता है (शुक्ल पक्ष), तब तिथियां भी बढ़ती हैं और जब चंद्रमा घटता है (कृष्ण पक्ष), तब तिथियां कम होती जाती हैं।

इस तरह, तिथि केवल एक दिन का संकेत नहीं देती, बल्कि यह चंद्रमा की गतिशीलता और उसकी कलाओं के अनुसार समय की धारणा को भी दर्शाती है। इसलिए, तिथि की गणना और समझ धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

तिथि चंद्र माह में चंद्र दिवस या चंद्रमा के चरण को दर्शाती है। पंचांग में सामान्यतः चार सप्ताह वाले महीने को चंद्र माह कहा जाता है। तिथि की गणना चंद्रमा और सूर्य की स्थिति के अनुसार की जाती है, जिसके कारण इसे "चंद्र-सौर कैलेंडर" भी कहा जाता है।

तिथि क्या है? (What is Tithi in Vedic Astrology?)

सरल शब्दों में समझें तो तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच 12 डिग्री के कोणीय अंतर को कहा जाता है। पूरा राशि चक्र 360 डिग्री का होता है। जब इस 360 डिग्री को 30 बराबर भागों में विभाजित किया जाता है, तो प्रत्येक भाग 12 डिग्री का बनता है — और वही एक तिथि कहलाती है।

इसका अर्थ यह है कि जब चंद्रमा सूर्य से 12 डिग्री दूर चला जाता है, तो एक तिथि पूर्ण होती है। जैसे-जैसे चंद्रमा आगे बढ़ता है, तिथि बदलती रहती है।

यह समझना आवश्यक है कि तिथि सौर दिन (24 घंटे) के बराबर नहीं होती। चंद्रमा की गति स्थिर नहीं होती, इसलिए तिथि कभी 19 घंटे की हो सकती है तो कभी 26 घंटे तक भी चल सकती है। यही कारण है कि कभी एक दिन में दो तिथियाँ आ जाती हैं और कभी कोई तिथि क्षय भी हो जाती है।

वैदिक ज्योतिष में तिथि को चंद्र ऊर्जा की अभिव्यक्ति माना गया है। चंद्रमा मन का कारक ग्रह है, इसलिए तिथि मानसिक और भावनात्मक स्थिति से गहराई से जुड़ी होती है।

तिथि की गणना कैसे की जाती है?

तिथि की गणना पूर्णतः खगोलीय गणित पर आधारित है। यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सटीक ज्योतिषीय गणना है।

गणना सूत्र

तिथि = (चंद्रमा की वर्तमान डिग्री – सूर्य की वर्तमान डिग्री) ÷ 12°

उदाहरण के लिए, यदि सूर्य 20° पर है और चंद्रमा 44° पर है, तो उनके बीच 24° का अंतर है।

24 ÷ 12 = 2

अर्थात द्वितीया तिथि चल रही होगी।

इस प्रकार प्रत्येक 12 डिग्री पर तिथि बदलती है।

पंचांग में तिथि का महत्व

हिंदू पंचांग केवल तारीख बताने का साधन नहीं है, बल्कि यह समय की आध्यात्मिक गुणवत्ता को समझने की प्रणाली है। इसी प्रणाली का एक प्रमुख आधार है — तिथि। तिथि यह बताती है कि किसी दिन का चंद्र प्रभाव कैसा है और उस दिन कौन-से कार्य शुभ या अशुभ माने जाते हैं।

तिथि क्या दर्शाती है?

तिथि सूर्य और चंद्रमा के बीच के कोणीय अंतर पर आधारित होती है। जब यह अंतर हर 12 डिग्री बढ़ता है, तो एक नई तिथि प्रारंभ हो जाती है। इसी कारण तिथि 24 घंटे की स्थिर अवधि नहीं होती; कभी यह कम तो कभी अधिक समय की हो सकती है।

यही वजह है कि पंचांग में केवल अंग्रेज़ी तारीख देखकर शुभ कार्य तय नहीं किए जाते, बल्कि तिथि को प्राथमिक महत्व दिया जाता है।

हिंदू पंचांग की 30 तिथियाँ – अर्थ, देवता और ज्योतिषीय महत्व

क्रमतिथिपक्षअधिदेवताज्योतिषीय स्वभावविस्तृत महत्व
1प्रतिपदाशुक्लअग्निआरंभ कारीनए कार्य, गृह प्रवेश, व्यवसाय प्रारंभ हेतु शुभ
2द्वितीयाशुक्लब्रह्मासौम्यसंबंध सुधार, यात्रा प्रारंभ
3तृतीयाशुक्लगौरीवृद्धि कारकधन, सौभाग्य और विवाह कार्यों के लिए शुभ
4चतुर्थीशुक्लगणेशविघ्नहर्ताबाधा निवारण, कर्ज मुक्ति
5पंचमीशुक्लनाग देवताविद्या कारकशिक्षा आरंभ, पूजा-पाठ
6षष्ठीशुक्लकार्तिकेयरक्षणकारीसंतान सुख, शत्रु नाश
7सप्तमीशुक्लसूर्यऊर्जा प्रधानस्वास्थ्य, सरकारी कार्य
8अष्टमीशुक्लदुर्गाउग्रशक्ति साधना, रक्षा कार्य
9नवमीशुक्लदुर्गातीक्ष्णसाहसिक कार्य, युद्ध, प्रतियोगिता
10दशमीशुक्लयमविजयदायकविजय, मुकदमे में सफलता
11एकादशीशुक्लविष्णुअत्यंत शुभव्रत, भक्ति, आध्यात्मिक उन्नति
12द्वादशीशुक्लहरिसंतुलितव्रत पारण, दान
13त्रयोदशीशुक्लशिवलाभकारीप्रदोष व्रत, रोग निवारण
14चतुर्दशीशुक्लरुद्रउग्रतंत्र साधना, शत्रु दमन
15पूर्णिमाशुक्लचंद्रपूर्णत्वदान, मंत्र सिद्धि, पूजा
16प्रतिपदाकृष्णअग्निआरंभघटते चंद्र का प्रारंभ
17द्वितीयाकृष्णब्रह्मासौम्यपारिवारिक कार्य
18तृतीयाकृष्णगौरीवृद्धिमानसिक शांति
19चतुर्थीकृष्णगणेशविघ्न नाशसंकट निवारण
20पंचमीकृष्णनागविद्याशिक्षा, मंत्र जप
21षष्ठीकृष्णकार्तिकेयरक्षारोग मुक्ति
22सप्तमीकृष्णसूर्यस्वास्थ्यचिकित्सा आरंभ
23अष्टमीकृष्णदुर्गाउग्रसाधना
24नवमीकृष्णदुर्गातीक्ष्णसाहसिक निर्णय
25दशमीकृष्णयमसंतुलितविवाद निपटान
26एकादशीकृष्णविष्णुश्रेष्ठउपवास, आध्यात्मिक साधना
27द्वादशीकृष्णहरिशुभदान, धर्म कार्य
28त्रयोदशीकृष्णशिवसमृद्धिधन संबंधी कार्य
29चतुर्दशीकृष्णरुद्रउग्रतांत्रिक साधना
30अमावस्याकृष्णपितृदेवगूढ़पितृ तर्पण, ध्यान

एक चंद्र माह में 30 तिथियां होती हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है। तिथियों को शुभ और अशुभ के आधार पर विभाजित किया गया है। यह विभाजन विभिन्न प्रकार की तिथियों के माध्यम से किया गया है,

तिथियों के पाँच वर्ग – नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता, पूर्णा

  1. नंदा (शुभ): यह श्रेणी उन तिथियों को दर्शाती है जो विशेष रूप से शुभ मानी जाती हैं। इसमें प्रतिपदा (1), षष्ठी (6), और एकादशी (11) शामिल हैं।
  2. भद्रा (आरोग्य): इस श्रेणी में तिथियों को स्वास्थ्य और कल्याण से जोड़ा जाता है। इसमें द्वादशी (12), द्वितीया (2), और सप्तमी (7) शामिल हैं।
  3. जया (विजय): ये तिथियां विजय और सफलता को दर्शाती हैं। इसमें तृतीया (3), अष्टमी (8), और त्रयोदशी (13) शामिल हैं।
  4. रिक्ता (नष्ट): इस श्रेणी में वे तिथियां आती हैं जो नकारात्मक मानी जाती हैं। इसमें चतुर्थी (4), नवमी (9), और चतुर्दशी (14) शामिल हैं।
  5. पूर्णा (पूर्णिमा या अमावस्या): यह श्रेणी विशेष रूप से पूर्णिमा और अमावस्या के दिन को संदर्भित करती है। इसमें पंचमी (5), दशमी (10), और अमावस्या/पूर्णिमा शामिल हैं।

तिथि के प्रकार – शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष

चंद्रमा की कलाओं के अनुसार, चंद्र माह को दो भागों में बांटा जाता है: शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।

  • शुक्ल पक्ष (बढ़ता हुआ चंद्रमा): यह चंद्रमा के वृद्धि के चरण को दर्शाता है, जब चंद्रमा का आकार बढ़ता है। इस पक्ष की तिथियों में प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक की तिथियां शामिल होती हैं। शुक्ल पक्ष की तिथियों को आमतौर पर शुभ माना जाता है, और इन दिनों विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करने का महत्व होता है।
  • कृष्ण पक्ष (घटता हुआ चंद्रमा): यह चंद्रमा के घटने के चरण को दर्शाता है, जब चंद्रमा का आकार धीरे-धीरे कम होता है। इस पक्ष की तिथियों में पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक की तिथियां शामिल होती हैं। कृष्ण पक्ष की तिथियों को सामान्यतः कुछ हद तक अशुभ माना जाता है, और इन दिनों को ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त समझा जाता है।

जन्म कुंडली में तिथि का महत्व

जन्म के समय जो तिथि चल रही होती है, उसे जन्म तिथि कहा जाता है। यह व्यक्ति की मानसिक संरचना, भावनात्मक प्रवृत्ति और कर्म दिशा को दर्शाती है।

चंद्रमा मन का कारक है और तिथि चंद्रमा से जुड़ी है। इसलिए जन्म तिथि व्यक्ति के आंतरिक स्वभाव को दर्शाती है।

उदाहरण:

  • एकादशी जन्म व्यक्ति को आध्यात्मिक झुकाव दे सकता है
  • नवमी जन्म व्यक्ति को साहसी बना सकता है
  • अष्टमी जन्म व्यक्ति को तीव्र और भावनात्मक बना सकता है

ज्योतिषीय विश्लेषण में केवल राशि देखना पर्याप्त नहीं होता — तिथि भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इस प्रकार, तिथि, शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का मिलाजुला उपयोग धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रत्येक तिथि और पक्ष का अपना-अपना विशेष अर्थ और महत्व होता है।

क्या आपके कोई प्रश्न हैं?

तिथि हिंदू कैलेंडर में चंद्र आधारित दिन है। यह सूरज और चांद के बीच एंगुलर संबंध को दिखाता है और इसका इस्तेमाल रस्मों, व्रतों और त्योहारों के लिए शुभ और अशुभ समय तय करने के लिए किया जाता है। हर तिथि का अपना महत्व और आध्यात्मिक असर होता है।

वैदिक ज्योतिष में नक्षत्र का मतलब 27 नक्षत्रों से है। हर नक्षत्र पर्सनैलिटी, रोजाना के कामों और ज़रूरी घटनाओं के समय पर असर डालता है। शादियों, बिज़नेस और दूसरे समारोहों के लिए अच्छा नक्षत्र चुनना जरूरी माना जाता है।

राहु काल हर दिन का एक खास समय होता है जिसे अशुभ माना जाता है। यह छाया ग्रह राहु से जुड़ा है और आमतौर पर नए काम, यात्रा या जरूरी काम शुरू करने के लिए इससे बचा जाता है। रोजाना के काम जारी रह सकते हैं, लेकिन बड़ी शुरुआत आमतौर पर टाल दी जाती है।

रोज़ाना का पंचांग किसी खास जगह के लिए सूरज, चांद और ग्रहों की स्थिति जैसे खगोलीय डेटा के साथ-साथ सूर्योदय और सूर्यास्त के समय का इस्तेमाल करके गणना की जाती है। यह दिन को तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार में बांटता है, जो मिलकर शुभ और अशुभ समय तय करते हैं।

हां, जगह के हिसाब से पंचांग बदलता है। क्योंकि सूर्योदय, सूर्यास्त और ग्रहों की स्थिति जगह के हिसाब से अलग-अलग होती है, इसलिए तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त और राहुकाल का समय एक शहर से दूसरे शहर में अलग हो सकता है। इसलिए, अपनी जगह के लिए खास तौर पर बनाया गया पंचांग देखना जरूरी है।

Reconnect with your Faith

UserUserUser
Trusted by 1 Lakh Devotees
100% Secure