अक्टूबर 2026 त्योहार कैलेंडर: Festivals in October
अक्टूबर के त्योहार
| त्योहार | अंग्रेजी दिन | वार | माह | पक्ष / तिथि | तिथि आरंभ | तिथि समापन |
|---|---|---|---|---|---|---|
| षष्ठी | 1 अक्टूबर | गुरुवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – षष्ठी | 12:35 PM, 1 अक्टूबर | 10:15 AM, 2 अक्टूबर |
| सप्तमी, गांधी जयंती | 2 अक्टूबर | शुक्रवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – सप्तमी | 10:15 AM, 2 अक्टूबर | 07:59 AM, 3 अक्टूबर |
| अष्टमी, जीवित पुत्रिका व्रत, कालाष्टमी | 3 अक्टूबर | शनिवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – अष्टमी | 07:59 AM, 3 अक्टूबर | 05:51 AM, 4 अक्टूबर |
| नवमी | 4 अक्टूबर | रविवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – नवमी | 05:51 AM, 4 अक्टूबर | 03:53 AM, 5 अक्टूबर |
| दशमी | 5 अक्टूबर | सोमवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – दशमी | 03:53 AM, 5 अक्टूबर | 02:07 AM, 6 अक्टूबर |
| इंदिरा एकादशी | 6 अक्टूबर | मंगलवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – एकादशी | 02:07 AM, 6 अक्टूबर | 12:34 AM, 7 अक्टूबर |
| द्वादशी, मघा श्राद्ध | 7 अक्टूबर | बुधवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – द्वादशी | 12:34 AM, 7 अक्टूबर | 11:16 PM, 7 अक्टूबर |
| त्रयोदशी, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि | 8 अक्टूबर | गुरुवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – त्रयोदशी | 11:16 PM, 7 अक्टूबर | 10:15 PM, 8 अक्टूबर |
| चतुर्दशी श्राद्ध | 9 अक्टूबर | शुक्रवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – चतुर्दशी | 10:15 PM, 8 अक्टूबर | 09:35 PM, 9 अक्टूबर |
| सर्वपितृ अमावस्या | 10 अक्टूबर | शनिवार | आश्विन | कृष्ण पक्ष – अमावस्या | 09:35 PM, 9 अक्टूबर | 09:19 PM, 10 अक्टूबर |
| नवरात्रि प्रारंभ, घटस्थापना | 11 अक्टूबर | रविवार | आश्विन | शुक्ल पक्ष – प्रतिपदा | 09:19 PM, 10 अक्टूबर | 09:30 PM, 11 अक्टूबर |
| स्कंद षष्ठी | 16 अक्टूबर | शुक्रवार | आश्विन | शुक्ल पक्ष – षष्ठी | 03:25 AM, 16 अक्टूबर | 05:54 AM, 17 अक्टूबर |
| सरस्वती पूजा, तुला संक्रांति | 17 अक्टूबर | शनिवार | आश्विन | शुक्ल पक्ष – संक्रांति | 05:54 AM, 17 अक्टूबर | 08:27 AM, 18 अक्टूबर |
| दुर्गा अष्टमी, महानवमी | 19 अक्टूबर | सोमवार | आश्विन | शुक्ल पक्ष – अष्टमी/नवमी | 08:27 AM, 18 अक्टूबर | 10:51 AM, 19 अक्टूबर |
| विजय दशमी, दशहरा | 20 अक्टूबर | मंगलवार | आश्विन | शुक्ल पक्ष – दशमी | 12:50 PM, 20 अक्टूबर | 02:11 PM, 21 अक्टूबर |
| पापांकुशा एकादशी | 22 अक्टूबर | गुरुवार | आश्विन | शुक्ल पक्ष – एकादशी | 02:11 PM, 21 अक्टूबर | 02:47 PM, 22 अक्टूबर |
| प्रदोष व्रत | 23 अक्टूबर | शुक्रवार | आश्विन | शुक्ल पक्ष – त्रयोदशी | 02:35 PM, 23 अक्टूबर | 01:36 PM, 24 अक्टूबर |
| शरद पूर्णिमा | 25 अक्टूबर | रविवार | आश्विन | शुक्ल पक्ष – पूर्णिमा | 11:55 AM, 25 अक्टूबर | 09:41 AM, 26 अक्टूबर |
| वाल्मीकि जयंती, मीराबाई जयंती | 26 अक्टूबर | सोमवार | कार्तिक | शुक्ल पक्ष – पूर्णिमा | 09:41 AM, 26 अक्टूबर | 07:01 AM, 27 अक्टूबर |
| करवा चौथ, वक्रतुंड संकष्टी | 29 अक्टूबर | गुरुवार | कार्तिक | कृष्ण पक्ष – चतुर्थी | 01:06 AM, 29 अक्टूबर | 10:09 PM, 30 अक्टूबर |
हिन्दू कैलेंडर अक्टूबर 2026 - व्रत एवं त्यौहार
शीतला अष्टमी (बसोड़ा) 01 अक्टूबर
शीतला अष्टमी, जिसे बसोड़ा भी कहा जाता है, माता शीतला को समर्पित व्रत है। इस दिन माता की पूजा रोग-रक्षा और परिवार के स्वास्थ्य के लिए की जाती है। इस व्रत में बिना आग जलाए हुए ठंडे भोजन का सेवन किया जाता है। मान्यता है कि माता शीतला देवी चिकनपॉक्स, दाद-खाज और महामारी जैसी बीमारियों से रक्षा करती हैं। माता को दही, शक्कर, ठंडा भोजन, हल्दी और नीम के पत्ते अर्पित किए जाते हैं। भक्त सुबह जल्दी स्नान कर स्वच्छता का संकल्प लेते हैं।
इस दिन माता का स्मरण करने से परिवार में स्वास्थ्य और खुशहाली बनी रहती है।
सर्वपितृ अमावस्या 02 अक्टूबर
सर्वपितृ अमावस्या को पितरों का अंतिम श्राद्ध माना गया है। जिन पितरों का श्राद्ध तिथि ज्ञात न हो, उनका श्राद्ध इसी दिन किया जाता है। इस दिन स्नान, तर्पण, दान और पितरों के नाम से भोजन कराने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन किया गया श्राद्ध सीधे पितरों तक पहुँचता है और वे आशीर्वाद देकर परिवार की रक्षा करते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या हमें अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की सीख देती है।
पित्र विसर्जन, पितृ पक्ष समाप्त 03 अक्टूबर
इस दिन पितृ पक्ष का समापन होता है और पितरों को विदाई दी जाती है। माना जाता है कि पितर पृथ्वी पर अपने वंशजों द्वारा किए गए श्राद्ध, तर्पण और दान ग्रहण कर पुनः अपने लोक को लौट जाते हैं। इस दिन तिल, जल और पिंडदान का विशेष महत्व है। भक्त अपने पितरों के लिए मंगलकामना करते हैं और उनसे सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
यह पर्व हमें अपनी जड़ों और वंश परंपरा के प्रति समर्पण का संदेश देता है।
माँ की चौकी / घट स्थापना (नवरात्रि) 03 अक्टूबर
नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना से होती है। इस दिन माँ दुर्गा के नौ रूपों का आवाहन कर कलश की स्थापना की जाती है। कलश में नारियल, आम के पत्ते और स्वच्छ जल रखा जाता है। भक्त घर और मंदिरों में माँ की चौकी सजाकर अखंड ज्योति जलाते हैं।
यह शुभारंभ शक्ति, सकारात्मक ऊर्जा और नए आरंभ का प्रतीक है। नवरात्रि के नौ दिन आत्मबल, साधना, भक्ति और अच्छे कर्मों को समर्पित होते हैं।
नवरात्रि द्वितीया (माँ ब्रह्मचारिणी) 04 अक्टूबर
नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। ये तप, संयम और आध्यात्मिक शक्ति का स्वरूप हैं। भक्त माँ को श्वेत पुष्प, कमल और बेलपत्र अर्पित करते हैं। इस दिन साधना और मनोबल को बढ़ाने के लिए जप-ध्यान किया जाता है।
विश्वास है कि माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा से ज्ञान, सफलता और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह दिन आत्मविश्वास और साहस को मजबूत बनाने का संदेश देता है।
नवरात्रि तृतीया (माँ चंद्रघंटा) 05 अक्टूबर
नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है। इनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित रहता है, इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। ये शांति, साहस और वीरता की देवी हैं। इस दिन भक्त माँ को सुगंधित पुष्प, दूध से बने प्रसाद और घी का दीप अर्पित करते हैं। माँ चंद्रघंटा की पूजा से भय, बाधा और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। ऐसा माना जाता है कि उनकी कृपा से जीवन में सौभाग्य और आत्मविश्वास बढ़ता है।
यह दिन साहस और संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है।
नवरात्रि चतुर्थी (माँ कूष्मांडा) 06 अक्टूबर
चतुर्थी के दिन माँ कूष्मांडा की पूजा की जाती है, जो ब्रह्मांड की सृजनकर्ता मानी जाती हैं। इन्हें अष्टभुजा देवी के रूप में पूजा जाता है। भक्त माँ को मालपुआ, कद्दू और लाल पुष्प अर्पित करते हैं। विश्वास है कि माँ की आराधना से जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और सफलता बढ़ती है।
यह दिन सकारात्मक सोच, हिम्मत और खुशहाली का प्रतीक माना गया है।
नवरात्रि पंचमी (माँ स्कंदमाता) 07 अक्टूबर
पंचमी के दिन माँ स्कंदमाता की पूजा होती है, जो भगवान कार्तिकेय की माता हैं। इनके दर्शन मात्र से ही भक्त को बालक जैसे निर्मल मन का आशीर्वाद मिलता है। माँ को पीले फूल और केले का भोग चढ़ाया जाता है।
इस दिन की साधना से बुद्धि, विनम्रता और परिवार में प्रेम बढ़ता है। माँ स्कंदमाता की कृपा से सफलता और संतान सुख मिलता है।
नवरात्रि षष्ठी (माँ कात्यायनी) 08 अक्टूबर
षष्ठी के दिन माँ कात्यायनी की आराधना होती है। ये रूप विवाह और प्रेम की देवी मानी जाती हैं। अविवाहित कन्याएँ अच्छे जीवनसाथी की कामना से उपवास रखती हैं। भक्त लाल पुष्प, सुहाग सामग्री और शहद अर्पित करते हैं।
माँ कात्यायनी की पूजा से शत्रुओं पर विजय, साहस और मनोकामना सिद्धि प्राप्त होती है। यह दिन दृढ़ निश्चय और आत्मबल का प्रतीक है।
नवरात्रि सप्तमी (माँ कालरात्रि) 09 अक्टूबर
सप्तमी के दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती है, जो दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाली देवी हैं। उनका स्वरूप भयंकर होते हुए भी भक्तों के लिए अत्यंत कल्याणकारी है। इस दिन धूप, गंध और गुड़ का भोग लगाया जाता है।
यह दिन भय पर विजय और आंतरिक शक्ति जगाने का अवसर देता है। माँ कालरात्रि की कृपा से बुरा समय दूर होकर संरक्षण प्राप्त होता है।
नवरात्रि अष्टमी (माँ महागौरी) 10 अक्टूबर
नवरात्रि के आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा की जाती है। इनका स्वरूप अत्यंत कोमल, शांत और उज्ज्वल होता है। ऐसा माना जाता है कि माँ की कृपा से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं और मनोवांछित फल मिलता है। इस दिन कन्या पूजन का भी विशेष महत्व होता है, जिसमें छोटी-छोटी बालिकाओं को देवी स्वरूप मानकर भोजन कराया जाता है।
माँ महागौरी का आशीर्वाद सौभाग्य, वैवाहिक सुख और समृद्धि को बढ़ाता है।
नवरात्रि नवमी (माँ सिद्धिदात्री) 11 अक्टूबर
नवरात्रि के अंतिम दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा होती है। वे सिद्धियों और चमत्कारों की देवी हैं। भक्त उनकी आराधना करते हुए पूर्णता, ज्ञान और आध्यात्मिक ऊर्जा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। नवमी के दिन कन्या पूजन और हवन करने से घर और परिवार में शुभता का वास होता है।
माँ सिद्धिदात्री की कृपा से सफलता के द्वार खुलते हैं और जीवन में नए अवसर प्राप्त होते हैं।
दुर्गा विसर्जन / विजयदशमी (दशहरा) 12 अक्टूबर
विजयदशमी बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक पर्व है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध कर धर्म की स्थापना की थी। कई स्थानों पर माँ दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन बड़े हर्ष और उत्साह के साथ किया जाता है। इस दिन शस्त्र-पूजन और वाहन-पूजन का बड़ा महत्व है ताकि जीवन में विजय और सुरक्षा बनी रहे।
यह पर्व हमें सत्य, साहस और धर्म के पथ पर चलने की प्रेरणा देता है।
पापांकुशा एकादशी 13 अक्टूबर
पापांकुशा एकादशी व्रत विष्णु भक्ति को समर्पित है। माना जाता है कि इस व्रत को रखने से सभी प्रकार के पाप नष्ट होते हैं और भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन उपवास रखकर भगवान वामन के स्वरूप की पूजा की जाती है।
यह एकादशी जीवन में अनुशासन, भक्ति और आत्मशुद्धि का संदेश देती है।
प्रदोष व्रत 14 अक्टूबर
प्रदोष व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्ति के उद्देश्य से रखा जाता है। यह व्रत त्रयोदशी को पड़ता है और खासकर शाम के समय पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि प्रदोष काल में की गई पूजा अत्यंत फलदायी होती है और सभी कष्टों का नाश करती है।
यह व्रत स्वास्थ्य, शांति और पारिवारिक सुख प्रदान करता है।
शरद पूर्णिमा 15 अक्टूबर
शरद पूर्णिमा को वर्ष की सबसे पवित्र पूर्णिमा माना जाता है। इसी रात चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ धरती पर अमृतमयी किरणें बरसाता है। माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा की रोशनी में रखी खीर का सेवन करने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है और रोग दूर होते हैं। यह रात भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला के लिए भी प्रसिद्ध है। भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
स्कंद षष्ठी 16 अक्टूबर
स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय को समर्पित पर्व है। इस दिन भक्त भगवान स्कंद की पूजा करते हैं, जिन्हें युद्ध देवता और भगवान शिव-पार्वती के पुत्र के रूप में पूजा जाता है। माना जाता है कि स्कंद षष्ठी पर उपवास करने से भय, शत्रु और बाधाओं का नाश होता है। दक्षिण भारत में यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाता है और धार्मिक झांकियों तथा स्तुतियों के माध्यम से भगवान स्कंद के पराक्रम का वर्णन किया जाता है।
सरस्वती पूजा / तुला संक्रांति 17 अक्टूबर
इस दिन ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की पूजा की जाती है। विद्यार्थी अपने पुस्तकों और वाद्ययंत्रों की पूजा कर ज्ञान, कला और बुद्धि की प्राप्ति की कामना करते हैं। यही दिन सूर्य के कन्या से तुला राशि में प्रवेश का भी होता है जिसे तुला संक्रांति कहते हैं। इसे कर्म-पथ पर आगे बढ़ने और नए आरंभ का शुभ समय माना जाता है। यह दिन शिक्षा, व्यापार और नई योजनाओं के लिए बहुत फलदायी होता है।
महानवमी 18 अक्टूबर
महानवमी नवरात्रि का नौवां व सबसे महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है जो सिद्धियों और आध्यात्मिक शक्ति की देवी मानी जाती हैं। बहुत से क्षेत्र में इस दिन कन्या पूजन, हवन और दुर्गा पाठ का समापन किया जाता है। माना जाता है कि महानवमी पर भक्तों की मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं और जीवन में ऊर्जा और सफलता का संचार होता है। यह दिन विजय और सकारात्मकता का प्रतीक है।
विजयदशमी / रावण दहन 19 अक्टूबर
विजयदशमी या दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था, इसलिए रावण दहन का आयोजन बड़े उत्साह के साथ किया जाता है। यह पर्व हमें धर्म, सत्य और साहस का पालन करने की प्रेरणा देता है। कई स्थानों पर माँ दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है। नए काम, नए व्यापार की शुरुआत के लिए यह अत्यंत शुभ माना जाता है।
यह दिन विजय, सम्मान और नए आरंभ का प्रतीक है।
दुर्गा विसर्जन / विजयदशमी / दशहरा 20 अक्टूबर
मुहूर्त
शुक्ल पक्ष दशमी प्रारंभ: 20 अक्टूबर, 12:50 PM
समाप्त: 21 अक्टूबर, 02:11 PM
दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसलिए कई स्थानों पर रावण दहन किया जाता है। नवरात्रि के बाद माँ दुर्गा की प्रतिमाओं का जल में विसर्जन किया जाता है और अगले वर्ष पुनः आगमन की प्रार्थना की जाती है। यह दिन नए कार्य, व्यवसाय, वाहन और शस्त्र-पूजन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। इस अवसर पर लोग एक-दूसरे को बधाई देते हुए विजय और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश देते हैं।
बंगाल विजयादशमी / विद्यारंभ 21 अक्टूबर
मुहूर्त
दशमी तिथि: 20 अक्टूबर 12:50 PM — 21 अक्टूबर 02:11 PM
बंगाल में इस दिन माँ दुर्गा का भव्य विसर्जन किया जाता है। महिलाएँ “सिंदूर खेला” में भाग लेकर सौभाग्य और शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इस दिन बच्चों के लिए “विद्यारंभ संस्कार” करवाया जाता है जिसमें पहली बार अक्षर लिखवाए जाते हैं, जिससे शिक्षा और ज्ञान का मार्ग शुभ होता है। ढाक की धुन, नृत्य और उत्सव की रौनक चारों ओर देखने को मिलती है। यह दिन खुशियों, शक्ति और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है।
पापांकुशा एकादशी 22 अक्टूबर
मुहूर्त
शुक्ल पक्ष एकादशी प्रारंभ: 21 अक्टूबर 02:11 PM
समाप्त: 22 अक्टूबर 02:47 PM
इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ रूप की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता है कि इस व्रत के पुण्य से जीवन के पापों का नाश होता है और स्वर्ग-लोक तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं। माता-पिता और पितरों की शांति के लिए यह व्रत अत्यंत शुभ माना गया है। दान-पुण्य और सत्संग का विशेष महत्व है।
प्रदोष व्रत 23 अक्टूबर
मुहूर्त
त्रयोदशी तिथि: 23 अक्टूबर 02:35 PM — 24 अक्टूबर 01:36 PM
पूजा का श्रेष्ठ समय: संध्या काल (प्रदोष बेला)
प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित है और संध्या के समय पूजा का विधान होता है। शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा चढ़ाया जाता है। यह व्रत मनोकामनाओं की पूर्ति, स्वास्थ्य, सुख और धन की प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी है। माना जाता है कि इस दिन शिव जी भक्तों की हर बाधा को दूर करते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। व्रती दिन भर उपवास रखकर शाम को पूजा करते हैं।
शरद पूर्णिमा 24 अक्टूबर
मुहूर्त
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 25 अक्टूबर 11:55 AM
समाप्त: 26 अक्टूबर 09:41 AM (24 अक्टूबर की रात चंद्र दर्शन और खीर की परंपरा)
शरद पूर्णिमा को वर्ष की सबसे पवित्र चांदनी रात माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण 16 कलाओं के साथ अमृत वर्षा करता है। इसलिए चंद्र किरणों में रखी खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है, जो स्वास्थ्य, सौभाग्य और प्रेम का प्रतीक है। यह रात भगवान कृष्ण की रासलीला से भी जुड़ी है। भक्त रात्रि जागरण कर चंद्र दर्शन का पुण्य अर्जित करते हैं।
वाल्मीकि जयंती / मीराबाई जयंती 25 अक्टूबर
25 अक्टूबर को महर्षि वाल्मीकि और भक्त शिरोमणि मीरा बाई की जयंती श्रद्धा से मनाई जाती है। इस दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर सुबह 11:55 बजे से शुरू होकर 26 अक्टूबर सुबह 09:41 बजे तक रहती है। महर्षि वाल्मीकि को संस्कृत साहित्य के प्रथम कवि और रामायण के रचयिता के रूप में सम्मान मिलता है। वहीं मीराबाई भगवान कृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति की प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं। इस दिन भजन-कीर्तन, कथा पाठ और सेवा कार्य किए जाते हैं। भक्त उनके आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा लेते हैं।
करवा चौथ / वक्रतुंड संकष्टी 29 अक्टूबर
करवा चौथ वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि के लिए किया जाने वाला व्रत है। इस वर्ष यह व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाएगा, जो 29 अक्टूबर रात 01:06 बजे प्रारंभ होकर 30 अक्टूबर रात 10:09 बजे समाप्त होगी। सुहागिनें पूरे दिन निर्जल व्रत रखकर चंद्रमा के उदय के बाद पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। इसी दिन वक्रतुंड संकष्टी व्रत भी मनाया जाता है, जो गणेश जी को समर्पित है। चंद्र दर्शन, गणेश स्तुति और दान-पुण्य अत्यंत फलदायी माना जाता है।

